परम पूज्य आचार्य श्री उमेशमुनिजी म.सा 'अणु' के विषय में ऐतिहासिक सामग्री...

णमो सिद्धाणं
जय गुरु उमेशाचार्य

* मन का मंदिर जब श्रद्धा के दीयों से झिलमिलाता है, जब सृजन होता है- भक्ति-गाथा का ! यह एक ऐसे युगपुरुष की गाथा है, जिनका नाम लब पर आते ही लाखों सिद्ध श्रद्धा से झुक जाते हैं, हाथों की अंजलि बन जाती है और अंतर्मन उस परमात्मा-स्वरूप के दर्शन पाकर प्रमुदित हो जाता है।

* बचपन का नाम 'उत्सवलाल' । झाबुआ जिले की थांदला नगरी में जन्मभूमि कहलाने का सौभाग्य प्राप्त किया। घोड़ावत कुलभूषण उत्सवलाल ने माताश्री नानीबाई की पावन कुक्षी में फागुन वदी अमावस (7 मार्च 1932, सोम.) के दिन जन्म लिया। धर्मनिष्ठ परिवार एवं पिताश्री रिखबदासजी के सु-संस्कार पाकर बालक उत्सवलाल में सद्‍गुणों की चाँद-दूज सी वृद्धि होने लगी।

* सद्‍‍-साहित्य का अध्ययन करते-करते संसार की असारता को जाना वैराग्य के बीज अंकुरित हुए। परिजनों के ह्रदय से नि:सृत वात्सल्य भी उत्सवजी के निश्चय को न डिगा सका और शासनेस प्रभु महावीर की जन्म-जयंती के पावन साक्ष्य के उजास में आपश्री की अमिट आस्था-स्थली पू. श्री सूर्य-गुरु ने 15 अप्रैल 1954 के दिन जन्म नगरी में ही आचार्य श्री उमेशमुनिजी के नाम से एक समर्थ शिष्‍य को पंचम पद की ऊँचाई पर पहुँचा दिया।

*  आचार्य श्री उमेश मुनिजी म.सा. जिनशासन के ऐसे पुजारी बने, जो आत्मा की पूजा करते-करते स्वयं पूज्य बन नए। 'अणु' से महान बन गए। आपश्री ने अब तक अपने मौलिक चिंतन द्वारा मोक्ष-पुरुषार्थ जैसी मूल्यवान कृति का सप्तभोगों में सृजन किया, तो लक्ष्य की ओर, आध्यात्म विशुद्धि, उठो! बढ़ो ! अपनी परंपरा, लग्न की बेला, जिनागम चिंतन जैसी सैकड़ों कृतियों का लेखन कर उपकृत किया है। आपश्री का प्राकृत भाषा पर प्रभुत्व है, तो आगम का गहन अध्ययन है।

* आपश्री का विचरण-क्षेत्र मध्यप्रदेश प्रमुख रूप से है ही, साथ ही उत्तरप्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात भी रहा है। आपश्री ने 'तिण्णाणं ‍तारियाणं' बनकर, लगभग 63 मुमुक्षु आत्माओं को ‍चरित्र रत्न प्रदान कर दीक्षित किया। आपश्री के त्याग-प्रभाव से कई आत्माएँ व्रत-नियम ग्रहण कर आत्मोत्थान में अग्रसर बन रही हैं !

* आपश्री की आध्यात्म-साधना प्रात: 3 बजे से प्रारंभ होकर रात्रि के प्रथम प्रहर तक अनवरत चल‍ती है, जिसमें लगभग एक घंटे तक किया गया लोगस्स का ध्यान महत्वपूर्ण है। ध्यान के पश्चात की 'मांगलिक' जिसे श्रद्धालु आस्था के साथ सुनते हैं और मनोकामना की पूर्ति पर चमत्कार कहते हैं। वास्तव में, वह आपश्री की अप्रमत्त साधना का ही प्रभाव होता है।


* आपश्री का लक्ष्य-दिशाविहिन आत्माओं को सन्मार्ग दिखाना, संस्कारविहिन पीढ़ी को सुसंस्कारी बनाना, स्वयं तिरना और भव्यों का तिराना ही है।

आपश्री‍ के जीवन में न दंभ है, न माया है। न पद की लालसा है, न अहं की छाया है। आपश्री का आचरण ही भव्यों के लिए आदर्श है। आपश्री की वरदहस्त भक्तों के लिए आधार है। जिनकी नजरों से करुणा के अमृत-बिंदु बरसते हैं, जिनकी एक कृपा दृष्‍टि के लिए भक्त तरसते हैं, ऐसे जन-जन शतायु हो ! चिरायु हो !

पथ भूलों को पथ दिखलाता,
असहायों का एक सहारा !
रात के इस सघन तम में,
सद्‍गुरु ही दिव्य सितारा !!

जय गुरु उमेश.... जय गुरु उमेश.... जय गुरु उमेश.... जय गुरु उमेश....

- साध्वी संयमप्रभा 'संयम'