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... और करुणा की धार फूटी
जब आचार्यश्री को लगा कि नवदीक्षित श्री दर्शनमुनि को केशलोचन से सम्भवत: तनिक पीड़ा हुई है तो उनके हृदय से करुणा की धार फूट पड़ी और समीप ही बैठे दर्शनमुनिजी का माथा शिखा के स्थान से सहलाते-सहलाते अपनी गोद में भर लिया और दो-तीन मर्तबा पीठ थपथपा दी। लघुवय में ही सिर से माता-पिता का साया खो चुके इस नवमुनिराज ने संयम प्राप्त करने के चंद लम्हों में ही आचार्य भगवंत का पितृतुल्य वो वात्सल्य और ऐसा दिव्य आशीर्वाद प्राप्त कर लिया, जिसके लिए श्रावक तो ठीक लम्बा संयमित जीवन जी चुके संत वृन्द भी तरसते हैं। और इस प्यास के दर्शन भी तत्काल ही हुए।

उपप्रवर्तक श्री प्रकाशमुनिजी निर्भर जो अति निकट से ही यह नजारा देख रहे थे, मानो उनके जेहन में एक बारगी यह विचार भी कौंधा हो कि संयम के सोपान पर चढ़ते ही इस मामले में चेला गुरु से बाजी मार गया है। वे आचार्यभगवंत से ऐसा ही वात्सल्य चाहने हेतु तत्काल प्रश्नवाचक शैली में बोल पड़े 'म्हने नी?' क्या देर थी, करुणा सागर ने उन्हें भी अपने आगोश में भर लिया व देर तक पीठ सहलाते रहे, थपथपाते रहे। यह दुर्लभ नजारा देख दर्शकों के रोम-रोम पुलकित हो गए तो कई की नयनों से हर्ष की धार फूट पड़ी। हे! करुणा सिंधु यह भौतिक रूप से संभव तो नहीं है कि हर कोई इस तरह आपके आगोश में समा जाए और आपके हाथों दिव्य आशीर्वाद पा जाए। पर जिन-जिन में ऐसी प्यास हो, भले ही श्रावक वर्ग ही क्यों न हो, उन पर ऐसी मैहर की घनघोर वर्षा भले अपनी दृष्टि से ही सही, पर जरूर-जरूर करना।

- हेमन्त चोपड़ा

जैन भागवती दीक्षा एवं अक्षय तृतीया पारणा महामहोत्सव

दिनांक 26 अप्रैल 2009 एवं 27 अप्रैल 2009 को इंदौर में होने वाले वर्तीतप आराधकों का पारणा कार्यक्रम में जिन आरधक को पारणा करना है, वे यह फार्म डाउनलोड करके फार्म में माँगी गई जानकारी पूर्ण रूप से भरकर दिए गए पते पर भेजें।

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