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2. संघ
की संस्थाएँ
संघ का मुख्य आधार स्थल स्थानक होता है। जहां बडा जन-समुदाय होता है,
वहाँ प्रायः दो धर्मस्थानक होते हैं- एक बडा और दूसरा छोटा। बडे
स्थानक उपासक जन धर्म-आराधना करते हैं और छोटे स्थानक में उपासिकाएँ।
यदि साध्वियोंका वर्षावास हों तो उपासिकाएँ बडे स्थानक में और उपासक
छोटे स्थानक में और साधुओं का वर्षावास हों तो उपासक बडे स्थानक में
और उपासिकाएँ छोटे स्थानक में वर्षावास धर्म-आराधना करती हैं।
संघ की कुछ संस्थाएँ स्थानक से जुडी हुई रहती हैं। जैसे 1. पुस्तकालय
और 2. पाठशाला ये छोटे स्तर के हों तो स्थानक से जुडे रहते हैं और बडे
हों तो अलग रहते हैं। कुछ संस्थाएँ स्थानक से संबंधित होते हुए भी
स्थानक से अलग रहती हैं जैसे आयम्बिल खाता। आजकल संघ में और दो
संस्थाओं का कहीं-कहीं आविर्भाव हुआ है- औषधायलय और भोजनशाला।
आयम्बिल खाता प्रायः भोजनशाला में चलता है या आयाम्बिलखाते में
भोजनशाला। दोनों स्वतंत्र भी हो सकते हैं।
मुझे यहां प्रमुख रूप से दो
संस्थाओं के विषय में कहना हैं- पुस्तकालय और पाठशाला।
1. पुस्तकालय - स्थानकों
में थोडी-बहुत पुस्तकों का संग्रह होता ही है। उन्हें व्यवस्थित रूप
से पुस्तकालय रूप मिल जाता है, तो उनका सदुपयोग हो सकता है।
पुस्तकालय में आगम और आधुनिक धार्मिक साहित्य का संग्रह होना योग्य
है। किसी एक व्यक्ति के हाथ में रहे। पुस्तकों का समुचित संरक्षण होना
चाहिए और पुस्तकों का आदान-प्रदान व्यवस्थित ढंग से होना चाहिए। किसी
के भी लिए पुस्तकालय खुला छोड देना ठीक नहीं है।
2.
पाठशाला- संघ के बालक-बालिकाओं में ज्ञान-प्रचार के लिए
जैन पाठशालाएँ बहुत ही उपयोगी हैं। पाठशालाएँ धर्म-संस्कारों की
निर्मात्री होती है, इसलिए पाठशालाएँ सुचारूरूप से चलाने के लिए
ध्यान देना आवश्यक है। आज अहिंसा के संस्कारों पर चारों ओर से हमले
हो रहे हैं। इसलिए पाठशालाओं में अहिंसा के संस्कारों
को दृढ़ करने की
ओर भी ध्यान देना चाहिए।
आयम्बिल खाता और औषधालय के विषय
में मैं नहीं बोल सकता हक्तँ, क्योंकि यह मेरा विषय नहीं है। ये दोनों
संस्थाएँ कहीं-कहीं ही होती हैं।
दो संस्थाओं की ओर संकेत करना शेष हैं। वे हैं ग्रन्थ भंडार और
छात्रावास। ये दोनों संस्थाएँ किसी एक संघ की होकर भी अनेक संघों से
सम्बद्ध हो सकती हैं।
ग्रंथ भण्डार-
प्राचीन हस्तलिखित ग्रंथों के
संग्रह को यहाँ ग्रन्थ भण्डार संज्ञा दी गई है। मध्यप्रदेश में कई
स्थानों पर स्थानकों में ग्रन्थ संग्रह हो सकती हैं। पहले ऐसे ग्रन्थों
का संग्रह गृहस्थों के घर भी मिल जाते थे। उन हस्तलिखित ग्रन्थों के
संरक्षण की परम आवश्यकता है। वे पुरातात्विक महत्व तो रखते ही हैंऔर
ये ग्रन्थ शोध-अन्वेषण में भी बहुत ही उपयोगी हैं। ये ग्रन्थ संग्रह
जहाँ-जहाँ भी हो, वहीं या उनका एक ही स्थान पर संग्रह-संरक्षण हो इसकी
आवश्यकता है। ऐसे भण्डारों के निरीक्षण से इनके रख-रखाव का ज्ञान हो
सकता है।
छात्रावास- मालवा में जैन छात्रावासों की बहुत ही कमी है। जब इनकी ही
कमी हैं तो जैन विद्यालयों की बात ही क्या कहें। जहाँ जैन विद्यालय
हैं भी तो जैन नाम को सार्थक नहीं करते हैं। जैन छात्रावासों में
जैन-धर्म के संस्कार दिए जा सकते हैं। सेवा भावी महानुभाव इस ओर
ध्यान दें तो कुछ काम हो सकता है।
इनके सिवाय साहित्य-प्रकाशन संस्थाएँ भी हैं।
3. आराधकों के
पारस्परिक दायित्व-
यह तीसरा
मुद्दा है। इनमें प्रमुख
पाँच बातों पर ध्यान देना है-
1. अपने ग्राम या नगर की जैन-जन-गणना
2. कौन जीवन-यापन और चिकित्सा करवाने में असमर्थ है, इसकी जानकारी
रखना। स्थानीय या अन्य स्थान की संस्थाओं आदि से उन्हें कैसे सहयोग
दिलाया जा सकता है- इसकी जानकारी के साथ इसके लिए उद्यत रहना।
3. अपने पारस्परिक या साभाजिक कलह तो संघ में नहीं उभरने देना और
राजनीतिक पार्टियों के कारण परस्पर पीडक नहीं बनना।
4. किसी कारण से संघ में भेद उत्पन्न हो गया तो उसे जल्दी ही शान्त
करना।
5. अपने पारस्परिक कलह को भी संघ के माध्यम से सुलझा लेना।
सांवत्सरिक क्षमा-याचना के साथ इसे समाप्त ही कर देना।
4.
धर्म-आराधना-
चौथा मुद्दा- धर्म आराधना है। यह
मुद्दा अत्यन्त महत्वपूर्ण है। सारी
संस्थाएँ इसी ही के लिए तो हैं।
1) नित्य प्रति शक्ति के अनुसार
आराधनात्रय की समाचारण करें-
(अ) दर्शन आराधना- नमस्कार मंत्र, माला,
वंदना, मुनिदर्शन आदि।
(आ) ज्ञान- आराधना- सामायिक,
प्रतिक्रमण, थोकडे आदि कण्ठस्थ करना और तात्विक ज्ञान की वृद्धि के
लिए स्वाध्याय करना। जैन ऐतिहासिक ज्ञान वृद्धि के लिए एतत्संबंधी
ग्रन्थों को पढना।
(इ) चरिताचरित आराधना- व्रतों का
स्वरूप समझकर यथाशक्ति उन्हें ग्रहण करना। धार्मिक अनुष्ठान सामायिक,
प्रतिक्रमण, तपस्या, ध्यान, कार्योत्सर्ग आदि यथाशक्ति करते रहना।
2) धर्म-आरधना में परस्पर सहयोगी
बनना। बन सके वहाँ तक स्वाध्याय आदि स्थानक में ही करना और सामूहिक
आराधना में उद्यमशील रहना।
5.
साधु-साध्वीकी भक्ति और उसमें विवेक-
1. अपने-अपने ग्राम से अन्य ग्राम साधु-साध्वियों के विहार में अपनी
भूमिका योग्य मार्ग बताने आदि की सेवा करना।
2. सेवा में विवेक रखना। उन्हें कष्ट नहीं हो ऐसा प्रयत्न करना,
परन्तु साध्वाचार की मर्यादा का उल्लंघन हो- ऐसे कार्य नहीं करना।
3. साधु साध्वियों के फोटो, वीडियो फोटो या कैसेट नहीं बनाना।
इस विषय में आप जरा गहराई से विचार करें। हम भगवान के भी फोटो,
प्रतिम आदि को महत्व नहीं देते हैं। फिर गुरु-जनों के फोटो आदि को
महत्व क्यों दिया जाए। परिचय के नाम पर प्रारंभ हुई फोटो लेने की यह
प्रथा कैसे विकृत रूप धारण कर चुकी हैङ्क्ष साधु-साध्वी भी फोटो
लिवान के शौकीन हो गए हैं। वे अपने कितन-कितने पोज देते हैं- फोटो के
लिएङ्क्ष वे अपनी हर अदा-प्रत्येक चेष्टा में से कइयों के फोटो
खिंचवाने को तत्पर रहते हैं। कुछ लोग शिकायत लाते हैं कि महाराज फोटो
अल्बम रखते हैं। यदि साधु-साध्वी ऐसा करते हैं तो यह दोष ही है।
परन्तु इस प्रवृत्ति में वेग देने वाले कौन हैं- इस विषय में स्वयं
ही सोचें। इस प्रवृत्ति को रोकने के लिए सदैव तत्पर रहना है।
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