जो मुझे आपसे कहना है...

सुज्ञ श्रद्धालु उपासक-जन! एवं उपासिकावृन्द!
जिनवर प्रभु तीर्थर देव के द्वारा स्थापित चतुर्विधतीर्थ के हम सदस्य हैं। हम अंतिम तीर्थरदेव भगवान महावीर देव के शासन के अनुयायी हैं। श्रमण भगवान महावीर देव ने अपनी साधना- अवस्था में एक रात्रि में मुहक्तर्त मात्र की निद्रा में दस स्वप्न देखें। उनमें पाँचवें स्वप्न में उज्ज्वल गायों का वृन्द देखा, जिसका फल बतलाया गया है- उनके द्वारा चतुर्विध संघ कीस्थापना होना। इस स्वप्न के फल सेयह आशय फलित होता है कि साधकों के लिए भी संघ-व्यवस्था आवश्यक है।

संगठित संघ में रहकर साधक धर्म-आराधना सुंदर ढंग से कर सकता है और आज के युग में संघ-संगठन और अधिक आवश्यक है। इसी दृष्टि से वर्धमान स्था. जैन श्रमण संघ का संगठन हुआ। उसके अनुयायी वर्ग के भी प्रवर्तक के गण के अनुसार गण की आवश्यकता के अनुसार संगठन अस्तित्व में आए।

पूना-सम्मेलन के पहले गण की आवश्यकतानुसार 'धर्मदासगण-परिषद्' की स्थापना की गई थी। जिसका उेश्य जैन साधु-साध्वियों की यथोचित सेवा में, श्रावक-श्राविका वृन्द की धर्म-आराधना में, उनकी संघ-व्यवस्था में और सामाजिक उत्थान में यथोचित सहयोग दिया जा सके।
वि.सं. 2041 में खाचरोद में परिषद् की स्थापना की विचारणा हुई। यह एक विचार रखा गया था। इस विषय में पक्ष-विपक्ष दोनों थे। फिर विचार-मन्थन में परिषद् के विधान की चर्चा हुई। विधान के रूप सामने आए। धार-निवासी स्वर्गीय श्री नितिन भाई ने इस विषय में अच्छी रुचि बतायी। उनके प्रयत्न से परिषद् का व्यवस्थित विधान प्रस्तुत हुआ और वि. सं. 2043, मेघनगर के वर्षावास में गण-परिषद् की स्थापना हुई। बस परिषद् की स्थापना हो गई, परन्तु बात कुछ आगे नहीं बढ पाई।

नागदा में वि.सं. 2046 में मीटिंग हुई। उस समय मात्र कुछ विचारणाएँ हुईं। वि.सं. 2047 में कोद-वर्षावास में वहाँ के संघ के उत्साह पूर्ण वातावरण में परिषद् का अधिवेशन हुआ। फिर वि.सं. 2048 पेटलावाद के वर्षावास में गण-परिषद् के सदस्यों का सम्मेलन हुआ, पर अभी तक जैसी चाहिए, वैसी सक्रियता नहीं आई है। अब 2050 के वर्षावास में आपका पुनः सम्मेलन हो रहा है। अभी तक क्या कार्य हुआ, इस विषय में मैं आपसे कहक्तँङ्क्ष- भले ही कछुए की चाल से भी कार्य चले, पर कार्य चले तो सही। धीमे-धीमे निरंतर कार्य करने पर भी काफी कार्य हो जाते हैं।
दो भागों में बाँटकर अपनी विचारणा प्रस्तुत कर रहा हक्तँ-

प्रथम- स्थानीय संघों के विषय में और द्वितीय परिषद् के विषय में। प्रथम विभाग गण-परिषद् का कार्य क्षेत्र है और दूसरे विभाग में परिषद् के कर्त्तव्य का सकेंत रहेगा।
स्थानीय संघों के विषय में छह मुद्दों पर विचार करना है। वे क्रमशः इस प्रकार हैं- 1. संघ और संगठन, 2. संघ की संस्थाएँ, 3. आराधकों का पारस्परिक दायित्व, 4. आराधना, 5. साधु-साध्वी की भक्ति और 6. सामाजिक दायित्व।

1. संघ और संगठन
श्रमण संघ के निर्माण के बाद प्रायः गाँव-गाँव में 'वर्धमान स्था. जैन श्रावक संघ' के नाम से संघों का गठन हुआ। जो यद्यपि पर्यन्त चल रहे हैं। उन संघों में अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, मंत्री आदि अधिकारी होते हैं।

अधिकारियों की चयन-पद्धति तीन प्रकार की ज्ञात हुई है- वह इस प्रकार हैं-1. चिर-कालिक, 2. नियतकालिक और 3. मिश्रित।

1. चिरकालिक चयन पद्धति में- अध्यक्ष आदि के चयन-काल का निर्धारण नहीं होता है। वे उन-उन पदों पर जीवन-पर्यंत बने रहते हैं या वृद्धावस्था में पद त्याग करके संघ का कार्य व्यवस्थित हाथों में सौंप देते हैं।

2. नियतकालिक चयन पद्धति में- प्रतिवर्ष, दो वर्ष या तीन वर्ष में अध्यक्ष आदि पदाधिकारियों का चुनाव होता है।

3. मिश्रित चयन पद्धति में-
संघ का ट्रस्ट और उसके ट्रस्टी स्थायी रहते हैं और एक संघपति भी स्थायी रहते हैं। फिर प्रतिवर्ष संघ-व्यवस्था के संचालन के लिए अध्यक्ष चुने जाते हैं और वे संघपति की राय से वर्षभर तक कार्य का संचालन करते है। वस्तुतः इसमें चुनाव के लिए चुनाव पद्धति नहीं अपनाई जाती है, परन्तु ट्रस्टी और संघपति योग्य व्यक्ति को कार्य संचालन के लिए आमंत्रित करते हैं।
इस प्रदेश में अधिकतर पहले और दूसरे प्रकार की पद्धति चलती है।

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