प्रतिक्रमण-संकल्प-सूत्र

 बीयं चउवीसत्थव आवस्सयं
पाठ 6 चउवीसत्थव (लोगस्स) सूत्र सामायिक सूत्र में दिया गया है।

पाठ 7- द्वादशावर्त-वंदना-सूत्र

इच्छामि खमासमणो ! वंदिउं जावणिज्जाए निसीहियाए,-

हे क्षमा श्रमण! (मैं) यथाशक्ति पाप से निवृत्त हुए और शरीर से (आपको) वंदना करना चाहता हूँ।
अणुजाणह मे मिउग्गहं- (अत:) मुझे अवग्रह में प्रवेश की आज्ञा दीजिए।
निसीहि, - मैं अशुभ क्रिया को रोकता हूँ।
अहो कायं काय-संफासं, - आपके चरणों को हाथ या सिर से छूता हूँ।
खमण्णिजो भे! किलामो, -  हे पूज्य! (मेरे स्पर्श से हुई) पीड़ा क्षमा योग्य है।
अप्पकिलंताणं बहु-सुभेणं-भे दिवसो ‍वइक्कंतो? ग्लानि से रहित आपका बहुत शुभ रूप से दिवस बीता?
जत्ता भे?- आपकी संयम-यात्रा निराबाध है?
जवणिज्जं च भे? और आपका मन तथा इंद्रियाँ आत्मानुकूल हैं?
खामेमि खमासमणो! देवसियं वइक्कमं, - हे क्षमाश्रमण! दिवस संबंधी मेरे अपराध की क्षमा चाहता हूँ।
* आवस्सियाए पडिक्कमामि। - आराधना से संबंधित आवश्यक क्रिया करते हुए जो दोष लगे हों उनसे निवृत्त होता हूँ।
खमासमणाणं देवसियाए आसायणाए तित्तीसन्नयराए- आप क्षमाश्रमण की दिवस में त‍ैंतीस में से कोई भी आशातना
जं किंचि मिच्छाए- जो कुछ भ‍ी मिथ्या भाव से की गई।
मणदुक्कडाए वयदुक्कडाए काय-दुक्कडाए - मन, वचन और काया की बुरी क्रिया से की गई।
कोहाए माणाए मायाए लोभाए- क्रोध, मान, माया और लोभ से की गई।
सव्व-कालियाए -  (दिवस भर के) समस्त काल की
सव्व-मिच्छोवयाराए- सभी विपरीत क्रियावाली और
सव्व-धम्माइक्कमणाए- सभी धर्मों की मर्यादा भंग करने वाली
आसायणाए जो मे देवसिओ- आशातना से मैंने दिवस संबंधी जो अतिचार किया।
तस्स खमासमणो! -  हे क्षमा श्रमण! उसका प्रतिक्रमण करता हूँ, निंदा करता हूँ।
गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि- धिक्कार देता हूँ, अपने को अलग करता हूँ।

चउत्थं पडिक्कमण-आवस्सयं
पाठ 8- आगमे तिविहे
पाठ 9- दर्शन-सम्यक्त्व

दंसण- सम्मत्त, - सम्यकदर्शन का सम्यग् व्यवहार-
परमत्थ-संथवो वा,  (1) परम-अर्थ (तत्त्वार्थ) का परिचय या गुणकीर्तन अवश्य ही करना,
सुविट्‍ठ-परमत्थ-सेवणा वावि।- (2) तथा परमार्थ के रहस्यज्ञ दृढ़ श्रद्धानी की तत्त्वज्ञ साधु की उपासना करना, किंतु, -
वावन्न-कुंदसण-वज्जणा, (पाठ्‍यांतर समणोवासयाणं) -  (3) दर्शन से (= सम्यक्त्व से) भ्रष्ट और (4) कुदर्शन (मिथ्या श्रद्धानी) का संग वर्जना।
इय सम्मत्त-सद्दहणा।। - यह सम्यक्त्व की श्रद्धा है।
समणोवासएणं - श्रावक के द्वारा (या के लिए)
एयस्स सम्मत्तस्स-  इस (ऊपर कहे हुए) सम्यक्त्व के
पंच अइयारा पयाला- बड़े या मुख्य (= दुर्गति में ले जाने वाले) पाँच अतिचार
जाणियव्वा, न समायरियव्वा- जानने योग्य हैं, आचरने योग्य नहीं।
तं जहाँ- ते आलोऊँ- 1. संका, 2. कंखा, 3. वितिगिच्छा, 4. पर-पासंडी-पसंसा, 5. पर-पासंडी-संथवो; दंसणस्स विसए जो मे देवसिओ अइयारो कओ, तस्स मिच्छा मि दुक्कडं।

(प्राचीन- [अतिचार-चिंतन रूप] भावार्थ-) श्री समकित रत्न पदार्थ के विषे जो कई अतिचार लागा होय ते आलोऊँ- 1. श्री जिनवचन सांचा करी सम्यक् श्रद्धा न होय, प्रतीत्या न होय, रूच्या न होय, 2. परदरसण की काँक्षा कीधी होय, 3. फल प्रत्येक संदेह आण्यो होय, 4. पर-पाखंडी की प्रशंसा कीधी होय, 5. पर-पाखंडी से संस्तव-परिचय कीधो होय; मारा समकिन रूप रतन के विषे रज-मेल लागो होय (तो तस्स मिच्छा मि दुक्कडं।)

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