प्रतिक्रमण-संकल्प-सूत्र

पाठ 1- प्रतिक्रमण-संकल्प-सूत्र

इच्छामि णं भन्ते तुब्भेहिं अब्भणुण्णाए समाणे देवसियं-पडिक्कमणं ठामि। हे पूज्य। मैं चाहता हूँ, कि आपकी आज्ञा प्राप्त होने पर दिवस संबंधी प्रतिक्रमण करूँ।
देवसिय-णाण-दंसण (अब) दैनिक चर्या में ज्ञान, दर्शन
चरित्ताचरित्त-तव-अइयार श्रावक के व्रत और तप में लगे हुए
चिंतणट्‍ठं करेमि काउस्सग्गं अतिचारों के चिंतन के लिए कायोत्सर्ग करता हूँ।
विशेष- इस सूत्र में दो अंश हैं- 1. प्रतिक्रमण का संकल्प और 2. कायोत्सर्ग का संकल्प। भगवान जिनेश्वरदेव का धर्म आज्ञा-प्रधान है। अत: पहले बताई हुई विधि से गुरुदेव से आज्ञा ली या अर्हंत-सिद्ध भगवान की साक्षी ली। पहले अंश में आज्ञा प्राप्त होने का हर्ष व्यक्त करके, प्रतिक्रमण करने का संकल्प किया गया है। प्रतिक्रमण का प्रारंभिक रूप आत्म (दोषों की) निंदा है। आप स्वयं दोषों को बुरा समझना आत्मनिंदा है। उसे करने के लिए, सूत्र के दूसरे अंश में कायोत्सर्ग का संकल्प किया गया है। आत्म-निंदा सामायिक का एक रूप-प्रतिक्रमण का मुख्य प्रवेश-द्वार है। इसलिए प्रतिक्रमण का प्रारंभ करने से पूर्व पहले आवश्यक रूप से इसे किया जाता है।

3. इस सूत्रांश में तीन प्रकार की सामायिक (श्रुत सामायिक, सम्यक्त्व-सामायिक और अगार सामायिक तप सहित) में लगे हुए दोषों के स्मरण हेतु कायोत्सर्ग करने की प्रतिज्ञा की गई है, जो प्रतिक्रमण करने के लिए आवश्यक है।

पाठ दूसरे और तीसरे के रूप में नमोक्कार-मंत्र और सामायिक-प्रतिज्ञा-सूत्र हैं, जो सामायिक सूत्र में पहले और आठवें पाठ के रूप में आ चुके हैं। नमोक्कार मंगला-चरण और सामायिक-सूत्र प्रतिज्ञा के स्मरण रूप हैं।

पाठ 4 - संक्षिप्त-प्रतिक्रमण-सूत्र

इच्छामि ठामि काउसग्गं, चाहता हूँ कि कायोत्सर्ग करूँ।
जो मे देवसिओ अइयारो कओ,  जो मैंने दैवसिक अतिचार किया,
काइओ वाइओ मा‍णसिओ, (वह) कायिक, वाचिक और मानसिक,
उस्सुत्तो उम्मग्गो अकप्पो, सूत्र से विरूद्ध, मार्ग=आराधना- विधि से विरुद्ध, कल्प=आचार से विप‍रीत,
अकरणिज्जो  नहीं करने योग्य
दुज्झाओ दुव्विचिंतिओ अशुभध्यान से युक्त, बुरे चिंतन से युक्त,
अणायारो अणिच्छियव्वो नहीं आचरने योग्य, वाञ्छा नहीं करने योग्य
असावग-पाउग्गो,  श्रावक के नहीं करने योग्य (अतिचार) हैं।
णाणे तह दंसणे चरित्ताचरिते, ज्ञान, दर्शन और चरित्ताचरित में
सुए सामाइए, श्रुत (=सूत्र-अर्थ रूप) धर्म और सामायिक में,
तिण्हं गुत्तीणं तीन गुप्ति= अशुभ या शुभाशुभ निवृत्ति की,
चउण्हं कसायाणं पाँच अणुव्रतों की,
तिण्हं गुणव्वयाणं तीन गुणव्रतों की
चउण्हं सिक्खावयाणं, चार शिक्षा = अभ्यास रूप व्रतों की,
बारस विहस्स सावगधम्मस्स इस प्रकार बारह प्रकार श्रावक धर्म की,
जं खंडियं जो खंडना = थोड़ी हानि की हो,
जं विराहियं, जो विराधना= अधिक हानि की हो तो
तस्स मिच्छा मि दुक्कडं उस ( =व्रतादि) की विराधना रूप दुष्कृत मेरे लिए मिथ्या हो।

पाठ 5- निन्यानवे अतिचार

(1) आगमे तिविहे पण्णत्ते, तं जहा-सुत्तागमे अत्यागमे तदुभयागमे। एवा श्रीज्ञान के विषे जे कोई अतिचार लाग्या होय ते आलोऊँ- 1. जं वाइद्धं, 2. वच्चामेलियं, 3. हीणक्खरं, 4. अच्चक्खरं, 5. पयहींण, 6. विणयहीणं, 7. जोगहीणं, 8. घोसहीणं, 9. सुट्ठुदिन्नं, 10. दुट्‍ठुपडिच्छियं, 11. अकाले कओ सज्झाओ, 12. काले न कओ सज्झाओ, 13. असज्झाइए सज्झाइयं, 14. सज्जाइए न सज्झाइयं, भणतां गुणतां विचारतां ज्ञान और ज्ञानवंत की आशातना कीधि होय (तस्स मिच्छा मि दुक्कडं)।
(जिनेश्वर देवों में) आगम तीन प्रकार का कहा है। वह इस प्रकार है- सूत्रागम=सूत्ररूप आगम, अर्थागम और सूत्र और अर्थ रूप उभयागम। ऐसे ज्ञान से संबं‍‍‍‍धित जो अतिसार लगे हों, उनकी मैं आलोचना करता हूँ, - जो (सूत्र) 1. आगे-पीछे बोले हों, 2. उपयोग शून्यता से सूत्रांश को कई बार बोले हों, तथवा एक-दूसरे में (सूत्र) मिलाए हों, 3. अक्षर छोड़ दिए हों, 4. अक्षर बढ़ाए हों, 5. शब्द छोड़ दिए हों, 6. विनय रहित बोले हों, 7. शून्यचित्त से बिना योग =
बिना मन, वचन, काया को तन्मय किए बोले हों, 8. उच्चारण-पद्धति से विपरीत बोले हों, 9 . अल्पमतिवाले को श्रुतज्ञ बनाने के उत्साह में उसकी ग्रहणा-शक्ति से अधिक पढ़ाया हो या जहाँ विराम लेना हो, वहाँ विराम लिए बिना पढ़ा-पढ़ाया हो, 10. अविधि-अविनय से ग्रहण किया हो, 11. अकाल में स्वाध्याय किया हो, 12. काल में स्वाध्याय नहीं किया हो, 13. अस्वाध्याय की स्थिति और स्थान में स्वाध्याय न किया हो- (इस प्रकार आगम पढ़ते हुए, गुनते= अर्थ को पढ़ते और विचारते= अर्थ का चिंतन करते हुए ज्ञान और ज्ञानी की आशातना की हो) तो उस (ज्ञान-आराधना) का दुष्कृत ‍मेरे लिए निष्फल हो।

आगे पढें...