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छठा पाठ - कायोत्सर्ग-प्रतिज्ञा |
| (कायोत्सर्ग
का हेतु और संकल्प-) |
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तस्स उत्तरी-करणेणं:- |
उस पाप
की या दूषित आत्मा की (आलोचनादि के) बाद की क्रिया करने या विशेष
उत्कृष्टता-श्रेष्ठता के लिए, |
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पायच्छित-करणेणं:- |
प्रायश्चित-पाप
का छेदन करने के लिए, |
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विसोही-करणेणं:- |
विशेष
शुद्धि करने या निर्मलता के लिए, |
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विसल्ली-करणेणं:- |
शल्य-रहित (=बाधक भावों से रहित) होने के लिए, |
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पावाणं-कम्माणं निग्घायणट्ठाए:- |
पाप
कर्मों का समूल नाश करने के लिए, |
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ठामि काउसग्गं:- |
मैं
कायोत्सर्ग =काया की क्रिया का त्याग करता हूँ- |
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(कायोत्सर्ग
के आगार-) |
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अण्णत्थ:- |
इन आगे
कहे जाने वाले आगारों के सिवाय, |
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उस्ससिएणं:- |
1.ऊँचा
श्वास ( = उच्छ् वास) लेने से, |
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निस्ससिएणं:- |
2. नीचा
श्वास (नि:श्वास) लेने से, |
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खासिएणं:- |
3.
खाँसी से, |
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छीएणं:- |
4.
छींक से, |
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जंभाइएणं:- |
5.
उबासी लेने से, |
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उड्डएणं:- |
6.
डकार आने से, |
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वाय-निसग्गेणं:- |
7.
अधोवायु निकलने से, |
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भमलीए:- |
8.
चक्कर आने से, |
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पित्त-मुच्छाए:- |
9.
पित्त के प्रकोप से (वमन या) मूर्च्छा आने से, |
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सुहुमेहिं अंग-संचालेहिं:- |
10.
थोड़े से शरीर के संचार से, |
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सुहुमेहिं खेल-संचालेहिं:- |
11.
थोड़े से खेंकार के संचार से, |
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सुहुमेहिं दिट्ठि-संचालेहिं:- |
12.
सूक्ष्म रूप से दृष्टि के संचार से, |
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एवमाइएहिं आगारेहिं:- |
इस
प्रकार और भी (अग्नि, सर्प, सिंह और पंचेंन्द्रिय जीव के
छेदन-भेदन) आगारों से, अभग्गो :- अभग्न-भंग नहीं, |
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अविराहिओ:- |
अविराधित |
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हुज्ज में काउस्सगो:- |
मेरा
कायोत्सर्ग होवे। |
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(कायोत्सर्ग की अवधि- ) |
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जाव अरिहंताणं भगवंताणं नमोक्कारेणं न पारेमि:-
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जब तक
अरिहंत भगवंतों को नमस्कार करके न पारूँ, |
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(कायोत्सर्ग की विधि- ) |
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ताव:- |
तब तक
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कायं:- |
काया
को |
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ठाणेणं:- |
आसन से
(-खड़ी, बैठी या सोई हुई स्थिर स्थिति में) स्थिर रखकर |
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मोणेणं:- |
मौन से
( = भाषा के स्पष्ट या अस्पष्ट उच्चारण के त्याग से) |
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झाणेणं:- |
ध्यान
से (= मन को चिंतन में लगाकर एकाग्रता से) |
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अप्पाणं वोसिरामि:- |
आत्मा
(= काया से होने वाली आत्मा की चेष्टाओं) को त्यागता हूँ अथवा
अपने (काय व्यापार) को त्यागता हूँ। |
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स्पष्टीकरण- 1. उत्तराध्ययनसूत्र
30/27 गाथा ठाणा वीरा-सणाईया के पद के अनुसार यहाँ 'ठाण' शब्द का
अर्थ आसन किया गया है और विषय के अनुसार उचित है। एगठाण शब्द का
ठाण शब्द इसी अर्थ की पुष्टि करता है। 2. उत्तरी... आदि
सूत्रांश का तृतीया विभक्ति के रूप में ही अर्थ किया जाए तो अर्थ
होगा- 'उत्तरीकरण, प्रायश्चितकरण, विशुद्धिकरण और विशल्यीकरण के
द्वारा पाप कर्म का समूल नाश करने के लिए कायोत्सर्ग करता हूँ।
अर्थात् पाप कार्य का नाश हेतु है, उत्तरीकरण आदि साधन हैं और
कायोत्सर्ग उन साधनों का सम्पादन का माध्यम है। 3. भमलीए
पित्तमुच्छाए- इन दोनों को संयुक्त करके एक आगार भी माना जाता
है। |
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सातवाँ पाठ
- चउवीसत्थव (चतुर्विशति-स्तव)
(कीर्तन की प्रतिज्ञा-) |
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1. लोगस्स उज्जोयगरे, - |
षड्
जीव-निकाय का स्वरूप बताने वाले या लोग में ज्ञानरूपी प्रकाशन
करने वाले, |
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धम्म-तित्थयरे जिणे।- |
धर्म-तीर्थ के स्थापक, राग-द्वेष के जीतने वाले, |
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अरिहंते कित्तइस्सं, - |
अरिहंत
देवों का कीर्तन (= नाम स्मरण) करूँगा, |
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चउवीसं पि केवली।।- |
चौबीसों
ही केवलज्ञानियों का। |
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(नाम-कीर्तन-) |
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2. उसभमजियं च वंदे, - |
ऋषभदेव
और अजितनाथ प्रभु को वंदन करता हूँ, |
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संभवमभिणंदणं च सुमइं च- |
संभवनाथ, अभिनंदनजी और सुमतिनाथ को, |
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पउमप्पहं सुपासं, - |
पद्मप्रभजी,
सुपार्श्वनाथजी को, |
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जिणं च चंदप्पहं वंदे।।- |
और
राग-द्वेष के जेता चंद्रप्रभजी को वंदन करता हूँ। |
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3. सुविहिं च पुष्पदंतं, - |
सुविधिनाथप्रभु, अर्थात् पुष्पदंतप्रभु को, |
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सीयल-सिज्जसं-वासुपुज्जं च। - |
शीतलनाथप्रभु, श्रेयांसनाथप्रभु और वासुपूज्यप्रभु को, |
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विमलमणंतं च जिणं- |
विमलनाथप्रभु और अनंतनाथजिनप्रभु को, |
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धम्मं संतिं च वंदामि- |
धर्मनाथ और शांतिनाथप्रभु को वंदन करता हूँ। |
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4. कुंथुं अरं च मल्लिं, - |
कुंथुनाथ, अरहनाथ और भगवती मल्लि को। |
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वंदे मुणिसुव्वयं नमिजिणं च। |
मुनिसुव्रतस्वामी और नमिजन को वंदन करता हूँ। |
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वंदामि रिट्ठनेमिं, - |
अरिष्ट
नेमिनाथप्रभु को वंदन करता हूँ। |
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पासं तर वद्धमाणं च।।- |
पार्श्वनाथप्रभु और उसी प्रकार वर्धमान स्वामी को। |
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(प्रार्थना-) |
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5. एवं मए अभिथुआ,- |
इस
प्रकार मेरे द्वारा नाम कीर्तन किए गए, |
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विहुय-रय-मला- |
रज-बँधते हुए कर्म और मल-बद्ध कर्म से रहित, |
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पहीण- जर-मरणा। - |
जरा =
क्रमिक क्षय और = आत्यन्तिक क्षय को पूर्णरूप से क्षय करने वाले, |
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चउवीसंपि जिणवरा,- |
राग-द्वेष के जेताओं में श्रेष्ठ चौवीसों ही, |
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तित्थरया मे पसीयंतु।।- |
तीर्थंकर मुझ पर प्रसन्न होवें। |
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6. कित्तिय-वंदिय-महिया, - |
वचन के
द्वारा कीर्तित, काया अर्थात् मस्तक द्वारा वंदित और मन के द्वारा
पूजित, |
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जेए लोगस्स उत्तमा सिद्धा- |
जो ये
लोक में उत्तम सिद्ध (हैं, वे), |
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आरुग्ग-बोहिलाभं, - |
= कर्मों
के उदय में अलिप्ता या स्वास्थ्य =अशातावेदनीय के उदय का
अभाव-मुक्ति और रत्नत्रय की सही समझ से युक्त प्रवृत्ति का लाभ, |
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समाहिवरमुत्तमं दिंतु।।- |
उत्तम
समाधि = चित्त की शांति देवें |
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7. चंदेसु निम्मलयरा, (समस्त) - |
चंद्रों
से निर्मल |
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आइच्चेसु अहियं - |
सूर्यों
से अधिक प्रकाशमान या |
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पयासरा। - |
प्रकाश
करने वाले |
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सागर-वर-गंभीरा,- |
स्वयंभूरमण महासमुद्र से भी गंभीर, |
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सिद्धा सिद्धिं मम दिसंतु।।- |
(तीर्थंकर)
सिद्धप्रभु मुझे सिद्धि देवें। |
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