आवश्यक-सूत्रम्‌ (सार्थ)

।। नमो जिणाणं ।।
नमोऽत्थुणं समणस्स भगवओ महावीरस्स
।। वंदे आयरियं धम्मदासं मुणिंदं ।।

सामायिक-सूत्र
 

पहला पाठ-नमोक्कार-मंत्र

णमो अरिहंताणं नमस्कार हो- अरिहंतो (= कर्म-मोहनीय, ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय, अंतरायरूपी शत्रुओं का नाश करने वालों) को या अर्हंतों (= देवेंद्रों से पूजितों या अनंत चतुष्ट्‍यरूप परम सामर्थ्य के धारकों) को।
णमो सिद्धाणं नमस्कार हो-सिद्ध (सकल कर्मों को क्षय करने वाले शुद्ध चैतन्य स्वरूप भगवंतों को।)
णमो आयरियाणं नमस्कार हो-आचार्य (संघ के नायक या संघ को मोक्षमार्ग पर अनुशासित रूप से ले जाने वाले संयमी मुनिराज) महाराजों को।
णमो उवज्झायाणं नमस्कार हो- उपाध्याय (= मोक्षमार्ग के पथिकों के शिक्षक संयमी मुनिराज) महाराजों को।
णमो लोए सव्व-साहूणं नमस्कार हो- (मानव) लोक में स्थित सभी साधु (= आत्म-साधक संयमी मुनि) महाराजों को।
एसो पंच-णमोक्कारो यह पाँचों को किया गया नमस्कार।
सव्व-पाव-प्पणासणो सभी पापों का प्रणाश करने वाला है।
मंगलाणं च सव्वेसिं और सभी मंगलों में।
पढमं हवइ मंगलं पहला मंगल है।

विशेष- 1. इसे नमोक्कार सुत्त कहते हैं। किंतु परंपरा से नमोक्कार मंत्र भी कहा जाता है। 2. जाप प्राय: पाँच पदों का किया जाता है। श्वेतांबर मूर्तिपूजक-परंपरा में गाथा सहित जाप की‍ पद्धति है।

दूसरा पाठ- गुरु-वंदन

तिक्खुत्तो आयाहिणं पयाहिणं करेमि तीन बार आदक्षिणा (= दोनों हाथ जोड़कर आपकी दाहिनी ओर से बायें कान तक) प्रदक्षिणा ( = बायें कान से दायें तक हाथों को घुमाकर आवर्तन) करता हूँ।
वंदामि नमंसामि स्तुति करता हूँ, (पंचांग- दो घुटने, दो कोहनियाँ व सिर नमाकर) नमस्कार करता हूँ।
सक्कारेमि सम्माणेमि सत्कार (बाह्य क्रिया से आदर प्रकट) करता हूँ, (ह्रदय से) सम्मान करता हूँ।
कल्लाणं मंगलं (आप) कल्याणकारी की-मंगलकारी की।
देवयं चेइयं देव-स्वरूप (= धर्मदेव) की, ज्ञान-संपन्न (या इष्‍ट देव की स्मृति कराने वाले) की।
पज्जुवासामि (मैं) पर्युपासना (= सेवा-एकाग्रता से आराधना) करता हूँ।
मत्थएण वंदामि शीस झुकाकर वंदना करता हूँ।

सूचना- (1) प्राय: प्रश्न उठता रहता है कि किसकी दाहिनी ओर से? कोई अपनी दाहिनी ओर से बताते हैं। वस्तुत: यह साक्षात् प्रदक्षिणा का प्रतीक रूप से हस्त- आवर्तन है। अत: वह वंदनीय की दाहिनी ओर से ऊपर ले जाते हुए बायीं ओर और वहाँ से नीचे की ओर ले जाते हुए दाहिनी ओर होने वाला हस्त-आवर्तन उचित लगता है। (2) गुजरात में करेमि शब्द नहीं बोलते हैं। (3) कोई-कोई प्रतिक्रमण के पूर्व क्षेत्र-विशुद्धि में भी इस पाठ का उच्चारण करते हैं।

तीसरा पाठ- सम्यक्त्व-सूत्र

अरिहंतो मह देवो, जावज्जीवं सुसाहुणो गुरुणो। जीवन भर के लिए अरिहंत भगवान मेरे देव और उत्तम साधु गुरु हैं।
जिण-पण्णतं तत्तं जिनेश्वरदेवों के द्वारा प्रतिपादित तत्त्व धर्म है।
* इअ सम्मत्तं मए गहियं। मेरे द्वारा यह सम्यक्त्व ग्रहण किया गया है।

* पाठांतर - इस अर्थात् यहाँ - जिनशासन की श्रद्धा मेंने ग्रहण कर है।

सूचना- सम्यक्त्व सूत्र का सदा उच्चारण दर्शन-विशुद्धि के लिए है।

चौथा पाठ- गुरु-गुण-स्मरण-सूत्र

1. पंचिंदिय संवरणो पाँचों इंद्रियों को संवर (= वश में रखना)
तह नवविह-बंभचेरगुत्ति-धरो। इसी प्रकार ब्रह्मचर्य की नव गुप्तियों (= रक्षा के नव नियमों) के धारक।
चउविह-कसाय-मुक्को चार प्रकार के कषायों से मुक्त अर्थात् क्रोधादि के प्रवाह में नहीं बहने वाले
इस अठ्‍ठारस-गुणे‍‍‍हिंसंजुत्तो इन अठराह गुणों से युक्त
2. पंच-महव्वय-जुत्तो पंच-विहायार-पालणसमत्थो पंचवि‍ध आचार-पालन में समर्थ
पंच-समिओ तिगुत्तो पाँच समितियों से सम्यक प्रवृत्ति वाले और तीन गुप्तियों से (अशुभ क्रिया से निवृत्त) गुप्त
छत्तीस-गुणो गुरू मज्झ (पहले के अठराह गुणों में इन अठराह गुणों को मिलाकर) छत्तीस गुणों वाले मेरे गुरु हैं।
विशेष :- (1) इंद्रिय-संवर अर्थात् शब्द आदि कामभोग में इंद्रियों को नहीं जुड़ने देना और शास्त्रादि श्रवण, जीवदयादि साधना में जोड़ना। (2) ब्रह्मचर्य-गुप्ति-धर अर्थात् अब्रह्म भाव के उत्पादक निमित्तों से दूर रह ब्रह्मचर्य की रक्षण-विधि का निर्वाह करने वाले। (3) कषायमुक्ति = क्रोध आदि को उदय में नहीं आने देना और उदय में आ गए हों तो उन्हें निष्फल कर देना। (4) युक्त अर्थात् सावद्ययोग के त्याग को स्मृति में रखने वाले। (5) समर्थ = आचार-पालन में त्रियोग की शिथिलता से रहित अथवा अप्रमत्त।

पाँचवाँ पाठ- 'इरियावहिय', आलोचना-सूत्र

इच्छाकारेणं संदिस्सह भगवं! हे भगवन् (आपकी) इच्छा के अनुसार (मुझे) आज्ञा दीजिए, जिससे।
इरियावहियं पडिक्कमामि! चलते हुए मार्ग में या संयम की साधना-प्रवृत्ति में लगे हुए दोषों का प्रतिक्रमण करूँ।
इच्छं, (गुरु की ओर से आज्ञा-) जैसी तुम्हारी इच्छा (या शिष्य की ओर से गुरु-प्रदत्त आज्ञा की स्वीकृति) आपकी आज्ञा प्रमाण है।
इच्छामि पडिक्कमिउं इरियावहियाए विराहणाए चलते हुए मार्ग में या साधना-मार्ग में हुई विराधना = संयम से विपरीत प्रवृत्ति रूप दोषों से निवृत्त होना चाहता हूँ।
गमणागमणे जाने-आने में या अन्य कायिक प्रवृत्ति में
पाणक्कमणे प्राणियों को कुचला हो
बीयक्कमणे सचित्त बीजों को कुचला हो
हरियक्कमणे वनस्पति को कुचली हो
ओसा-उत्तिंग-पणग-दगमट्‍टी-मक्कडा-संताणा-संकमणे ओंस, कीड़ी के नगर या धूल में गोल घर करके रहने वाले जीव, फूलन, कच्चा जल, सचित्त मिट्‍टी और मकड़ी के जाले कुचले हों
जे मे जीवा विराहिया इस प्रकार मेरे द्वारा जीवों की विराधना हुई हो,
(जीवों के पाँच प्रकार-)
एगिंदिया एक- स्पर्शन इंद्रिय वाले जीवों,
बेइंदिया दो- स्पर्शन और रसनेन्द्रिय वाले जीवों,
तेइंदिया तीन- स्पर्शन, रसना और घ्राणेद्रिंय वाले जीवों,
चउरिंदिया चार- स्पर्शन, रसना, घ्राण और चक्षुरिन्द्रिय वाले जीवों और
पंचिंदिया पाँच-स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु और श्रोत्रेन्द्रिय वाले जीवों को
(विराधना के दस प्रकार-)
1. अभिहया सामने आये हुओं को हने हों या रोके हों,
2. वत्तिया धूल आदि से ढँके हों,
3. लेसिया पृथ्वी आदि पर मसले हों, रगड़े हों,
4. संघाइया इकट्‍ठे करके परस्पर टकराये हों,
5. संघट्‍टिया कुछ स्पर्श करके दु:ख दिया हो-दु:खित किए हों,
6. परियाविया परितापित = अन्य प्रकारों या चारों ओर से दु:खी किए हों,
7. किलामिया क्लेशित-अधमरे या (झटकारने आदि से) अधघायल या बेहोश किए हों
8. उद्दविया उद्‍विग्न-मानसिक पीड़ा से युक्त या त्रस्त किए हों,
9. ठाणाओं ठाणं संकामिया (उनके) स्थान से दूसरे स्थान पर रखे या डाले हों,
10. जीवियाओ ववरोविया जीवन से रहित कर दिए हों तो
तस्स मिच्छा मि दुक्कडं दोष कि की गई बुरी क्रिया मेरे लिए = निष्फल हो।

आगे पढें...