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तिविहार उपवास का पच्चक्खाण
उग्गए सूरे अब्भत्तट्ठं पच्चक्खामि; तिविहं पि आहारं-असणं पाणं खाइमं
साइमं; अन्नत्थऽणाभोगेणं सहसागारेणं, पारिट्ठावणियागारेणं
महत्तरागारेणं सव्वसमाहिवत्तियागारेणं, पाणस्स लेवाडेण वा अलेवाडेण
वा स-सित्थेण वा असित्थेण वा अच्छेण वा बहलेण वा वोसिरामि।
टिप्पण- 'तिविहाहार' उपवास में सूर्यास्त से पूर्व पाणाहार का त्याग
करना आवश्यक है। पाठ-पाणाहार पच्चक्खामि-अण्णत्याभोगेणं सहसागारेणं
सव्व समाहिवत्तियागारेणं वोसिरामि।
दिवसचरिमं-भवचरिमं का पच्चक्खाण
दिवस (भव) चरिमं पच्चक्खामि। चउविहं पि आहारं-असणं पाणं खाइमं साइमं;
अन्नत्थऽणाभोगेणं सहसागारेणं, 'महत्तरागारेणं'
सव्व-समाहिवत्तियागारेणं वोसिरामि।
दिवस (या भव) के अंतिम समय के प्रत्याख्यान करता हूँ...
टिप्पण- 1. दिवस चरिम और भव चरिम में महत्तराकार संभव नहीं है। दिवस
चरिम में वस्तुत: तीन ही आगार हैं। 2. भव चरिम तिविहार भी हो सकता
है। अभिग्रह के
पच्चक्खाण
उग्गए सूरे... अभिग्गहं पच्चक्खामि। चउविहं पि आहारं-असणं पाणं खाइमं
साइमं पच्चक्खामि; अन्नत्थऽणाभोगेणं सहसागारेणं महत्तरागारेणं
सव्व-समाहिवत्तियागारेणं वोसिरामि।
सूर्योदय से (अमुक समय या अगले सूर्योदय तक) अभिग्रह का प्रत्याख्यान
करता हूँ...। दया
के पच्चक्खाण
उग्गाए सूरे छज्जीव-णिकाय-विराहणं (पंचासवदाराणं) च पच्चक्खामि एगविहं
एगविहेणं न करेमि कायसा। तस्स भंते! पडिक्कमामि निंदामि, गरिहामि
अप्पाणं वोसिरामि।
अर्थ - सूर्योदय से छह जीव-निकाय सहित पाँच आस्त्रवदारों का एक करण
और योग से सेवन करने का प्रत्याख्यान करता हूँ। मैं आस्त्रवों का काया
से सेवन नहीं करूँ...।
दया पारने का पाठ
जाने-अनजाने किसी जीव की विराधना कीधी होय किसी आस्त्रव का सेवन किया
हो तो तस्स मिच्छा मि दुक्कडं।
टिप्पण- दयाव्रत पारने के लिए तीन नवकार, उपर्युक्त पाठ और फासियं...
पूरा पाठ बोलना चाहिए।
दसवाँ व्रत के पच्चक्खाण
दसवाँ देशावगासिक व्रत (प्रतिदिन प्रभात से प्रारंभ करके) पूर्वादिक
छहों दिशा में जितनी दिशा की मर्यादा की उस उपरांत स्व-इच्छा काया से
चाकर पाँच आस्त्रव-सेवन का पच्चक्खाण जाव अहोरर्त्त दुविहं तिविहेणं
न करेमि, न कारवेमि मणसा वणसा कायसा; तथा जितनी भूमिका खुली रखी,
जिनमें जो द्रव्यादिक की मर्यादा की, उस उपरांत उपभोग-परिभोग निमित्ते
भोगने का पच्चक्खाण, जाव अहोरत्तं एगविहं तिविहेणं, न करेमि मणसा वयसा
कायसा, तस्स भन्ते! पडिक्कमामि निंदामि गरहामि, अप्पाणं वोसिरामि।
दसवाँ व्रत पारने का पाठ
दसवाँ व्रत के विषे जो कोई अतिचार लागा हो, ते आलोऊँ- नियमित भूमि से
बाहर की वस्तु मँगाई हो, भिजवाई हो, शब्द करी जणाई हो, रूप करी बताई
हो, वस्तु डालके समस्या जणाई हो, तस्स मिच्छा...
पौषध व्रत लेने का पाठ
ग्यारहवाँ (पडिपुण्ण-) पौषधव्रत- चउविहं पि आहारं असणं पाणं खाइमं
साइमं का पच्चक्खाण, अबंभ सेवन का पच्चक्खाण, अमुक मणि-सोवण्ण का
पच्चक्खाण, मालावण्णग-विलेपन का पच्चक्खाण, शस्त्र-मुशलादिक
सावज्जजोग का पच्चक्खाण; जाव अहोरत्तं पज्जुवासामि दुविहं तिविहेणं न
करेमि, न कारवेमि मणसा वयसा कायसा तस्स भन्ते! पडिक्कमामि निंदामि
गरिहामि, अप्पाणं वोसिरामि। टिप्पण- 1. पौषध
व्रत के दो भेद प्रतिपूर्ण और देश। एक सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक
पूरे आठ प्रहर का पौषध प्रतिपूर्ण पौषध है और आठ प्रहर से कम पाँच
प्रहर आदि का देश पौषध है। 2. अमुक मणि-सुवर्ण अर्थात् निकाले न जा
सके ऐसे आभूषणों या साधारण रूप से पहने हुए आभूषणों के सिवाय अन्य
आभूषणों के प्रत्याख्यान। 3. माला= पुष्पमाला आदि। वण्णग= शरीर को
सुशोभित करने के लिए लगाए गए जाने वाले पदार्थ। विलेपन= शरीर को आराम
पहुँचाने के लिए लगाए जाने वाले सुगंधित पदार्थ।
पौषध पारने का पाठ
ग्यारहवाँ (पडिपुन्न) पौषधव्रत के विषे जो कोई अतिचार लागा होय, ते
आलोऊँ- पौषध में शय्यासंथारा न देखा हो- बुरी तरह से देखा हो; न पूँजा
हो, बुरी तरह से पूँजा हो; लघुनीत-बड़ी नीति के स्थान को न देखा हो,
बुरी तरह से देखा हो; न पूँजा हो, बुरी तरह से पूँजा हो; पौषध को
सम्यक् प्रकार से न पाला हो, पौषध में निद्रा-विकथा की हो तो तस्स...।
संवर लेने का पाठ
द्रव्य से- पाँच आस्त्रव सेवन का त्याग, क्षेत्र से-लोक-प्रमाण, काल
से- थिरता प्रमाण, भाव से- नवकार के भांगे एक करण, एक या तीन योग से-
अप्पाणं वोसिरामि।
सूचना- लेने की विधि सामायिक के समान भी की जाती है। किंतु
बहुप्रचलित विधि के अनुसार पाँच नमोक्कार बोलकर संवर ग्रहण किया जाता
है और वैसे ही पाला जाता है।
मौन- प्रतिज्ञा का पाठ
(मौन की प्रतिज्ञा का पाठ कहीं देखा नहीं। परंतु वह निम्नलिखित रूप
में हो सकता है।)
एगं मुहुत्तं मोणं करेमि, अन्नऽत्थणाभोगेणं सहसागारेणं
सव्वसमाहिवत्तियागारेणं वोसारामि।
सभी पच्चक्खाण पारने का पाठ
.... पच्चक्खाणं कयं, त पच्चक्खाणं सम्मं काएणं फासियं पालियं सोहियं
तिरियं किट्टियं आराहियं आणाए अणुपालियं भवइ। जं च न भवइ, तस्स
मिच्छा मि दुक्कडं।
टिप्पण- 1. जो पच्चक्खाण किए हो, उस पच्चक्खाणं का नाम... इस चिह्न
वाले स्थान पर कहना चाहिए। 2. सभी पच्चक्खाणों के पारने का यह पाठ
अवश्य करना चाहिए।
विधि के विषय में- 1. दसवें और ग्यारहवें व्रत के पच्चक्खाण करने के
लिए सामायिक-ग्रहण-विधि के अनुसार ही विधि है। मात्र प्रतिज्ञा के
पाठ के स्थान पर इन व्रतों के पच्चक्खाण के पाठ पढ़े जाते हैं और बाद
में उसी प्रकार 'नमोऽत्थुणं का पाठ दो बार पढ़ा जाता है। 2. पारने की
विधि भी सामायिक पारने की विधि के समान ही है। अंत में अपने-अपने
व्रतों के अतिचार कहे जाते हैं। शेष पाठ वे ही हैं।
निद्रा-दोष-निवारण के लिए 'पडिक्कमामि पगाम-सिज्जाए' का पाठ भी पढ़ा
जाता है।
।। इति छठा आवश्यक ।। |