प्रतिक्रमण की विधि

प्रथम निरवद्य स्थान देखकर विधिपूर्वक सामायिक करें। यदि कारणवशात् सामायिक न कर सकें तो संवर धारण करें। फिर शासनेश महावीरस्वामी को या गुरुदेव हो तो उन्हें वंदना करके, 'चउवीसत्थव' की आज्ञा लें। चउवीसत्थव में नमोक्कार मंत्र (अरिहंतो) इरियाव हिय, तस्स उत्तरी, (काउस्सग्ग में) दो लोगस्स या इरियावहिय का पाठ कहें। फिर काउस्सग्ग पालकर प्रकट लोगस्स कहे। फिर दो बार नमोऽत्थुणं का पाठ कहें। फिर गुरु को वंदना करके, आवश्यक (प्रतिक्रमण) की आज्ञा लेकर, प्रथम आवश्यक प्रारंभ करें।

प्रथम आवश्यक की विधि- गुरु के सन्मुख या पूर्व-उत्तर दिशा में मुँह रखकर, अपने स्थान पर खड़ा रहे। यदि खड़ा न रह सके तो सुखासन से बैठ जाए। फिर पाठ पढ़े- इच्छामि णं भंते, नमोक्कार मंत्र, करेमि भंते, इच्छामि ठामि, तस्स उत्तरी-कायोत्सर्ग मुद्रा में स्थित होकर- 99 अतिचार का पाठ। जिसे अतिचार नहीं आते हों, वह सुने या बीस नमोक्कार बोले, ‍नमो अरिहंताणं, काउग्गस विशुद्धि का पाठ।

द्वितीय आवश्यक की विधि- प्रथम सामायिक आवश्‍यक पूरा हुआ, दूसरे आवश्‍यक की आज्ञा- यह कहकर (मतांतर-वंदना करके) नमस्कार मुद्रा में खड़ा रहे या बैठे। फिर लय के साथ लोगस्स का पाठ कहे।

तृतीय आवश्‍यक की विधि- द्वितीय आवश्यक पूरा हुआ, तीसरे आवश्यक की आज्ञा- यह कहकर (मतांतर- वंदना करके) गुरु के सन्मुख या पूर्व अथवा उत्तर की दिशा में मुँह रखकर खड़ा रहे।

अणुजाणह मे-मिउग्गहं। निसीहि कहकर, आसन छोड़कर, दोनों घुटने खड़े रखकर बैठें और दोनों हाथ जोड़कर उन्हें घुटनों के बीच रखें। फिर छह आवर्तन करें। अहो कायं काय शब्दों पर तीन आवर्तन देना। दोनों हाथ कोहनी तक मिलाकर, दशों अंगुलियाँ जमीन (या पूँजनी) पर या गुरु चरणों पर स्पर्श करते हुए मंद स्वर से अ अक्षर कहना, फिर दशों अंगुलियाँ मस्तक पर लगाकर, उच्च स्तर से हो अक्षर कहना। यह एक आवर्तन हुआ। इसी प्रकार कायं और काय के विषय में भी समझना चाहिए। ये तीन आवर्तन हुए। (फिर सिर झुकाना) जत्ता भे जवणि-ज्जं च भे पर भी तीन आवर्तन देना।

भूमि पर हाथ स्पर्श करते हुए मंद स्वर से ज मध्य में, जुड़े हुए हाथ रखकर मध्यम स्वर से त्ता और ललाट पर हाथ रखते हुए उच्च स्वर से भे का उच्चारण करना। इसी प्रकार शेष दो शब्द-समूहों के विषय में भी समझना। ये भी तीन आवर्तन हुए। (फिर सिर झुकाना)। कुल छह आवर्तन हुए। फिर आवस्सियाए पडिक्कमामि कहते हुए खड़े होना और शेष पाठ खड़े-खड़े ही कहना। दूसरा पाठ भी इसी प्रकार करना। इतना अंतर है कि दूसरे पाठ में आवस्सियाए पडिक्कमामि इतना पाठ नहीं कहा जाता और पूरा पाठ उँकडूँ आसन से ही कहा जाता है। इस प्रकार बारह आवर्तन होते हैं। इसलिए इसे द्वादशावर्त वंदना भी कहा जाता है। फिर कहना कि 'तीसरा आवश्यक पूर्ण हुआ।'

चौथे आवश्यक की विधि- 'चौथे आवश्यक की आज्ञा' कहकर चौथे आवश्यक की आज्ञा लेना। खड़े रहकर - आगमे तिविहे, दंसण सम्मत्त और बारह व्रतों के संपूर्ण पाठ कहना, पल्यंकासन से संलेषणा और हाथ जोड़कर मस्तक झुकाकर, अठारह पाप स्थान, पच्चीस मिथ्यात्व, चौदह समूर्च्छिमजीवों का पाठ कहना। पश्‍चात् नमस्कार करके, श्रमण-सूत्र पढ़ने की आज्ञा लेना। डाबा (= बायाँ) घुटना नीचे दबाकर, जीमणा घुटना ऊँचा रखना और (उस पर) दोनों हाथ जोड़कर, इच्छामि णं भन्ते, नमोक्कार मंत्र, करेमि भन्ते, चत्तारि मंगल, इच्छामि पडिकम्मिउं जो मे देवसिओ अइयारो कओ और
इच्छामि पडिक्कमिउं इरियावहियाए के पाठ कहना। फिर निद्रादोष-निवृत्ति (पडिक्कमामि पगामसिज्जाए), भिक्षा-दोष निवृत्ति (पडिक्कमामि गोयरग्य चरियाए), स्वाध्याय प्रतिलेखन-दोष-निवृत्ति (चउक्काल सज्झाए) और तैंतीस बोल का पाठ कहना। अब्भुट्‍ठिओमि शब्द के यहाँ से खड़े रहकर पूरा पाठ व क्षमापनसूत्र खड़े-खड़े कहना। फिर इच्छामि खमासमणो का पाठ दो बार। दोनों घुटने मोड़कर नमस्कार मुद्रा में भाव-वंदना आदि के पाठ क्रमश: कहना। अनंत चौबीसी आदि पलांठी से।

पाँचवें आवश्यक की विधि- कुलकोड़ी का पाठ कहने के बाद 'चौथा आवश्यक संपूर्ण हुआ' कहकर, पाँचवें आवश्यक की आज्ञा लेना। यथाशक्ति खड़े रहकर या सुखासन से बैठकर इच्छामि णं भन्ते, नमोक्कार महामंत्र, करेमि भन्ते, इच्छामि ठामि, तस्स उत्तरी के पाठ कहकर, कायोत्सर्ग करना, जिसमें यथाकाल नियत लोगस्स के पाठ का चिंतन और नमोक्कार चिंतन। कायोत्सर्ग खोलना। लोगस्स और दो बार इच्छामि खमासमणो।

छठे आवश्यक की विधि- पाँचों आवश्यक के नाम बोलकर 'जं वाइद्धं' कहना और छठे आवश्यक की आज्ञा लेना। फिर गुरु मुख से या बड़े श्रावकजी से, ये कोई नहीं हो तो स्वयं प्रत्याख्यान करना और पहली सामायिक से लगाकार सुखे बैठां तीन नौकार गिनना तक पाठ खड़े रहकर बोलना। विधिपूर्वक दो नमोत्थुणं आदि, गुरु वंदना आदि-

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प्रतिक्रमण के भेद और विधि

प्रतिक्रमण के पाँच प्रकार हैं- देवसिअ (= दिवस के अंत में किए जाने वाला), राइअ (= रात्रि संबंधी), पक्खिय (=पक्ष-पंद्रह दिन संबंधी), चाउम्मासिय (= चार मास संबंधी) और संवच्छरिय (= वर्ष भर संबंधी)। इस पुस्तक में 'देवसिय' प्रतिक्रमण के पाठ हैं। अत: जैसा प्रतिक्रमण करना हो, वैसे शब्द का प्रयोग करना चाहिए। जैसे-

जहाँ देवसिओ शब्द हो, वहाँ राइओ, पक्खिओ, चाउम्मासिओ, या संवच्छरिओ शब्द कहना। जहाँ देवसियं शब्द हो वहाँ राइयं, पक्खियं, चाउम्मासियं या संवच्छरियं शब्द कहें।

दिवसो वइक्कंतो के स्थान पर राई वइक्कंता, पक्खो वइक्कंतो, चाउ‍म्मासं वइक्कंतं या सवंच्छरो वइक्कंतो बोलना।

देवसियाए के स्थान पर राइयाए पक्खियाए, चाउम्मासियाए या संबच्छरियाए बोलना।

देवसियस्स के स्थान पर राइयस्स, पक्खियस्स, चाउम्मासियस्स या संवच्छरियस्स कहना।