अणु संदेश

क्षमा अर्थात्‌ सहनशीलता

क्षमा अर्थात्‌ सहनशीलता। मन सहनशील कैसे बने? तीन प्रकार से सहनशीलता की वृद्धि हो सकती है_ चिंतन से, आवेश में नहीं बहने से और अभ्यास से।

चिंतन के दो रूप_ दूसरों की परिस्थिति और कर्मोदय की दशा तथा अपने में सहनशीलता की मात्रा का।

शांत और प्रसन्न रहने से आवेश में बहने से बचा जा सकता है।

'हम भी मनुष्य है' 'हमारी भी कामनाएँ है' आदि भावों से परे सहन करने का अभ्यास अपने ही उपकार के लिए करना चाहिए।

जन्म भव

जन्म भव का प्रवेश-द्वार है। अत: जिसे भवसागर से पार होना है, वह जन्म ले ही नहीं। यह कब हो सकता है? - जब आयुष्य कर्म का बंध न हो। यह भी कब हो सकता है? - सदा आराधना में अप्रमत्त रहने पर।

मरण भव का निर्गम-द्वार है। जो कहीं प्रवेश करता है, उसे वहाँ से अवश्‍य निकलना पड़ेगा। इसी प्रकार जिसे मरण नहीं चाहिए, उसके लिए यह संभव नहीं है कि जन्म लिया है तो मरण न हो! उसे भव से निकलना ही होगा। हाँ, आयुष्य-कर्म का बंध न हो, तो वह अजन्मा हो सकता है। जन्मदिन यही संदेश देता है।
सेंधवा
7/3/2004
चैत्र कृ.- 1; 2060

सफल व्यक्तित्व

एक छोटी-सी चिनगारी। अंधेरे में विलीन नहीं होने देती है- अपना व्यक्तित्व। उजालें में भी चमकती है- मंद ही सही, पर चमकती है।

छोटी-सी चिनगारी और छोटी-सी उसकी जिंदगी। पर वह अंतिम क्षण तक चमकती हैं। चमकना ही तो उसकी जिंदगी है।

छोटी-सी है काया उसकी। पर अनुकूलता पाने पर, वामन से विराट बनने से नहीं चूकती। उसकी वामन काया जब विराट होती है, तब जड़ जङ्गम जगत् डोल उठता है।

प्रतिकूलता में बुझ जाती है वह। पर यों ही नहीं बूझ जाती। बूझते-बूझते भी क्षणिक उष्मा छोड़ जाती है।

मानव ! तू क्यों निराश होता है? चमक, जितनी भी हो जिंदगी, जिंदगी भर चमक, अज्ञान से जूझ, ज्ञान के विराट, पुञ्ज के समक्ष नतमस्तक हो, तू भी अनुकूलता पाकर, विराट्‍ बन। इस देह से विराट्‍ न बन सके तो भी कुछ हानि नहीं, कुछ न कुछ उष्मा छा ही जाएगी- जग में।

- आचार्य श्री उमेशमुनिजी