आज मैंने लक्ष्य पाया

दीक्षा के दिन महावीर-जयंती थी। दीक्षा की विधि एवं दीक्षा के कार्यक्रम में शासनपति भगवान महावीर के गुणानुवाद शेष थे। अत: रात्रि में भगवान महावीर के गुणानुवाद स्वरूप व्याख्यान रखे गए। आप भी संतों के साथ विराजमान थे। श्री समीरमुनिजी म. ने आपको व्याख्यान देने हेतु कहा एवं सभा में भी कहा गया- 'अभी नवदीक्षित संत आपके सामने व्याख्यान देंगे।' सभी उत्सुक थे- आपको सुनने के लिए। क्योंकि लगभग सात वर्ष के वैराग्यकाल में आपने 'सम्यकदर्शन' मासिक पत्रिका में 'उमेशचंद्र जैन' और 'अणु' जैन के नाम से लेखन-कार्य भी किया था। चिंतन में मौलिकता भी थी। अत: आपको सुनने में उत्सुकता होना स्वाभाविक था। आप भी आज्ञा-पालन करते हुए गुरुजनों को वंदन करके खड़े रहे- प्रारंभिक वंदन-व्यवहार के बाद आपने प्रारंभ किया-

'धर्म प्रेमी भाइयों और बहनों!' जनता की उत्सुकता बढ़ रही थी। आपने आगे कहा- 'आज महावीर-जयंती है।' जनता की उत्सुकता बढ़ रही थी। लेकिन न जाने क्यों, इतना कहकर आप आगे बोल नहीं पाए। इधर संत भी उत्साह बढ़ा रहे थे, उधर जनता एकटक निहार रही थी, पर आप मौन! क्या पता अत्याधिक प्रसन्नता से आपके मुँह से शब्द ही निकले पाएँ हों! तब पू. श्री किशनलालजी म.सा. ने कहा- 'बैठी जा! बैठी जा! (बैठ जा) और बात सँवारने के लिए पू. श्री मालवकेसरीजी म.सा. ने सभा को संबोधित करते हुए कहा-

'नवदीक्षित मुनिजी की मौन देशना ही आपको बहुत कुछ शिक्षा दे रही है। इन्होंने सत् संकल्प में दृढ रहकर प्राप्य को पाकर ही विश्राम लिया। धर्मकार्य में तो पुरुषार्थ मुमुक्षजनों को करना है- यही इनकी मौन देशना के भाव हैं?'

इस प्रकार आपकी प्रथम देशना मौन रही और मौन भावों में ही आप मुनित्व में रममाण हो गए। आपका प्रसन्न मन गा रहा था-

आज मैंने 'लक्ष्य' पाया, जिंदगी का ध्रुव सितारा

थांदला नगरी में ही दीक्षा-समारोह के 7 दिन पश्चात् 'बड़ी-दीक्षा थी, जिसे शास्त्रीय-भाषा में 'छेदोप स्थापनीय चारित्र' कहा जाता है। सामायिक-चारित्र ग्रहण करने के पश्चात् विशिष्ट श्रुत का अध्ययन करके साधु जीवन की शुद्धि के लिए पूर्व के दोषों को नि:शेष करके पुन: जो दीक्षा आरोपण होता है, उसे छेदोपस्थापनीय चारित्र' कहा जाता है।

तो निश्चित समय में आपश्री को बड़ी दीक्षा प्रदान करने की विधि पू.श्री किशनलालजी म.सा. के द्वारा संपन्न हुई। अब संयमानुभूति का सूर्योदय 'सूर्य-गुरु' के सानिध्य में प्रारंभ हो चुका था। सुदूर यात्रा पर निकले यात्री की तरह पूर्व तैयारी तो थी ही। आप छोटी उम्र से ही बुद्धि के निधान थे और संकल्प बल से ही आपने लक्ष्य को पाने में सफलता अर्जित की थी।

'चेतना के स्तर पर मुनि को प्रतिक्षण जाग्रत रहना है। अन्यथा उसके साधुत्व की तिजोरी को प्रमाद-रिपु रिक्त कर सकते हैं।' गुरुदेव के इन भावों को आपने जीवन में उतारने का प्रयास किया। गुरु-चरणों में प्राप्त वात्सल्यवारि से मनोमुकुल ने विकास पाया। संयम के अरुणोदय से ही आपकी रुचि अध्ययन-अध्यापन में विशेष रही। फिर वक्तृत्व/कर्तृत्व में उभरी। सरस अध्यात्मानुभूतियुक्त वाणी अजस्त्र प्रवाह रूप में जनमानस को छूने लगी। ज्ञान-भानु से उद्‍गत रश्मियाँ समाज को नई रोशनी देने लगी। और आपके लिए विकास के द्वार प्रतीक्षा करने लगे! कहा भी है-

जे य बुद्धा महाभागा, वीरा सम्मत्त दंसिणो।
सुद्धं तेसिं परक्कंतं, अफलं होई सव्वसो।।

(सूत्र कृतांग, अ. 8गा. 23)

- जो व्यक्ति धर्म-‍तत्त्व के स्वरूप का जानकार हो, धर्म के रहस्य को जाननेवाला हो, पूज्यनीय हो, आठों कर्मों को क्षय करने में समर्थ वीर हो और सम्यक् दृष्‍टि हो उसका तप-संयम आदि धर्म, धर्म-क्रियाएँ निदान रहित शुद्ध और निर्मल तथा कर्म के नाश के लिए होती हैं।

जो मनुष्‍य प्रति मास दस लाख गायों का दान करता है, उसको भी 'संयम' श्रेय है- कल्याणकारक है, भले ही वह किसी को कुछ भी दान न दे।
-उत्तराध्ययन सूत्र 9/40