बिदाई की बेला

'मनुष्‍य भव में आत्मलक्ष्य की सिद्धि के लिए सर्वविरति अर्थात् पंच महाव्रतधारी साधुत्व का स्वीकार ही करणीय है'- यह बात आपश्री के रोम-रोम में इस तरह से बसी हुई थी, जैसे पुष्‍प की हर पंखुड़ी में सुवास! अंतराय कर्मों का आवरण हट चुका था। प्रतिकूलता के बादल बिखर गए थे और परिजनों की अनुमति तथा गुरुजनों की सहमति से अहिंसा के अवतार, विश्व वंदनीय श्रमण भगवान महावीर देव के जन्म-कल्याणक दिवस का चयन 'श्रमण-जीवन' में प्रविष्ट होने के लिए किया गया।

जिनके शासन में सम्यक् रूप से संयम-यात्रा पर चलने का सुअवसर साधकों को प्राप्त हो रहा है, उन्हीं का जन्म-कल्याणक! उनका जन्म तो सभी साधकों के लिए ही नहीं, समस्त प्राणियों के लिए कल्याणकारी है ऐसे तीर्थपति का जन्मोत्सव और आपश्री का दीक्षा महोत्सव! अद्‍भुत संयोग था। वैसे ब्राह्मण, पक्षी और साधुओं को 'द्विजन्मा' कहा जाता है, क्योंकि संसार की यात्रा पूर्ण करके साधु आत्म-कल्याण की यात्रा के उद्देश्य से गृह-त्याग करता है और यह उसका दूसरा जन्म होता है।

तो चैत्र सुदी 13, संवत् 2011, गुरुवार (15 अप्रैल, 1954) का मंगलमय दिवस! अंतर जागरण की यात्रा का प्रारंभ होने जा रहा था। सारी खुशियाँ थांदला नगरी के प्रांगण में 'सूर्य-गुरु' के दरबार में उतर आई थी।

दीक्षार्थी को शुभ-आशीर्वाद प्रदान करने हेतु महाराष्ट्र-मंत्री पंडित रत्न पू.श्री किशनलालजी म., मालव केशरी पू.श्री सौभाग्यमलजी म., पू.श्री कस्तूरचंदजी म. के संत पू. श्री हस्तिमलजी म., पु.श्री चंदनमुनिजी म. ‍आदि सं‍त रत्न तथा पू.श्री (छोटा) सज्जनकुँवरजी म., पू.श्री मेहताबकुँवरजी म. की प्रशिष्या श्री मैनाकुँवरजी म., श्री कौशल्याज‍ी म. सहित साध्वी-मंडल विराजमान था।

दीक्षा अवसर पर थांदला के ही पोरवाल परिवार की पुत्रवधू कमलामाताजी ने लगभग डेढ़ घंटे में मेहंदी लगाई। वैसे तो वैराग्य रंग में पूर्णत: रंगी आत्मा के लिए मेहंदी का रंग तो क्षणिक था। फिर भी सभी का मन रखने के लिए आपने इन्कार नहीं किया। सारी रस्मों से गुजरते हुए भी आपका मन अर्जुन के समान अपने लक्ष्य के ओर ही लगा हुआ था।

सेठ रिखबचंदजी ने नौ दिन त‍क दीक्षा-उत्सव मनाया। किसी भी प्रकार की कमी नहीं रहने दी। कमी थी तो सिर्फ वे बाहर नजर नहीं आते थे। पूरे समय उन्होंने अपने आपको आगे दुकान के एक कमरे तक सीमित रखा। माता नानीबाई की परिस्थिति कठिन थी। जब पतिदेव की मानसिकता ज्ञात हुई, तो कहलवाया कि 'अब ऐसा करने से क्या होगा? खुशी-खुशी बिदा करना ही हमारा धर्म है।' लेकिन पुत्र से आँख मिलाने की स्थिति नहीं थी। एकांत में वे पुत्र-वियोग के स्मरण मात्र से आँसू बहाते रहे।

प्रव्रज्या-ग्रहण के दिन ही प्रात: लगभग चार बजे के आसपास उन्हें हल्की-सी झपकी लगी और स्वप्न में उन्होंने देखा- 'एक देव दिव्य प्रकाश के सात चरणों में उपस्थित है। उन्हें हौले-हौले जगाते हुए कहा रहा है- 'सुनो! तुम्हारे पुत्र के दीक्षा-महोत्सव की खुशियाँ तुम मानव ही नहीं, हम स्वर्ग के देवी-देवता भी अपूर्व उल्लास के साथ मना रहे हैं। यह असाधारण निकट भविष्‍य में मोक्ष पाने वाली दिव्य विभूति है।

धन्य है तुम्हें जो तुम उनके जन्मदाता कहलाए! इसलिए मैं तुम्हें देखने आया हूँ।'... देव तो अदृश्य हो गया और पिताजी एकदम उठ बैठे। कहाँ? कौन? सच में देवता आए थे! सोचने लगे वे- 'मानव से महामानव बनने वाले इस संयमी धारक के लिए देवगण भी मंगल-कामनाओं की बरखा कर रहे हैं। सच में मेरा कुलदीपक आज आत्मशक्ति का प्रतीक बन गया है। देव भी उसके त्याग की अनुमोदना कर रहे हैं। और... मैं... मैं. अभागा। जब तक वह मेरे पास रहा कुछ भी तो नहीं किया मैंने उसके लिए। न पितृत्व का दायित्व निभाया- न अपने कर्तव्यों को समझा। फिर भी वह अपने दृढ़ संकल्प पर अ‍‍‍डि़ग रहा और आज प्रशस्त प्रव्रज्या पथ पर प्रयाण कर रहा है। कल हमारी आँखों से- हमारे घर-आँगन से ओझल हो जाएगा...।'

सोचते-सोचते पुन: वे व्यथित हो गए। इधर बृहद्‍थाल जिसे लोक भाषा में बिरद थाल कहा जाता है- कार्यक्रम था। वैसे तो परिजनों द्वारा मंगल रूप लापसी के कौर मुँह में दिए जाते हैं, लेकिन बड़ा परिवार... इतनी लापसी खाए कैसे? अत: गुड़ की छोटी-छोटी डलियाँ बनाई गईं। गुड़ भी मंगल-पदार्थ होता है। क्रमश: सभी बहनें मुँह में डली देकर मंगल-आशीष दे रही थी।

उस समय कल्याणपुरा निवासी श्री भूरालालजी घोड़ावत की माताजी की आँखों में आँसू आ गए। तब नानीबाई ने उन्हें रोकते हुए कहा- 'मंगल-प्रसंग में रोना क्या? खुशी-खुशी हमें दीक्षा देना है।' देखिए एक माँ का फौलादी ह्रदय! अं‍तर्वेदना को उसने बाहर व्यक्त नहीं होने दिया और सभी को खुश रखने की ही प्रेरणा दी! क्या हम डंके की चí