मैं जिंदा हूँ- दीक्षा लेकर ही रहूँगा!

अपूर्व उत्साह था मन में, अद्‍भुत रोमांच था- तन में। एक-एक दिन एक युग जैसा प्रत‍ीत हो रहा था। बाधाएँ अनुकूलता में परिवर्तित हो गई थी, पथ सहज हो चुका था। सभी ओर से निश्चिंतता थी और संपूर्ण जीवन सादगीमय ढंग से व्यतीत किया था आपने। अत: आप चाहते थे- दीक्षा भी सादगीपूर्ण ही हो। पाट-दीक्षा अर्थात् चातुर्मास में ही दीक्षा हेतु निवेदन किया। लेकिन परिवार वाले चाहते थे- धूमधाम से दीक्षा करवाएँगे, दीक्षा तय होने ही वाली थी कि किसी ने आपके पिताश्री रखबचंदजी को भरमा दिया कि अभी शुक्र तारा अस्त हो गया है। फिलहाल यह मंगल-कार्य करवाना उचित नहीं है।

परिजनों ने सोचा- ज्योतिषी के मना करते हुए कार्यक्रम का आयोजन रखेंगे और उमेश को कुछ हो गया तो? अत: मोहाभिभूत होकर उन्होंने दीक्षा-मुहूर्त लगभग 6-7 माह के लिए आगे बढ़ा दिया। आपको तो ज्योतिष-मुहूर्त मंत्र-तंत्रादि बातों पर विश्वास नहीं था। लेकिन आपने सोचा- 'जैसे-तैसे इतने बरसों बाद इन्होंने आज्ञा दी है। लगता है, अभी मेरे कुछ अंतराय कर्म शेष हैं। जितने वर्ष आज्ञा के लिए इंतजार करना पड़ा, अब उतने महीने ही सही।' इस प्रकार मन को समझा लिया।

इसी बीच टाइफाइड हो गया। बुखार उतरने का नाम ही नहीं ले रहा है। बुखार की वजह से कमजोरी भी बढ़ी है। दिन भर सोए ही रहते थे। आँखें बंद-गुमसुम... अचेत सा। न खाना भात