अनुज्ञा की प्राप्ति

चिंतन के अनंत-सिंधु में भाव-विशुद्धि की लहरों पर लहराती जीवन-नैया को खेते हुए वह अध्यात्म-देवता की खोज में था और जिनशासन के विराट सागर की अटल गहराइयों में गोता लगाने के लिए आतुर था। विद्या उसके साथ विनोद करने के लिए लालयित थी। वैराग्य अभिनंदन के लिए विनीत मुद्रा में नमन कर रहा था।

इस अध्यात्म-पुरुष को पाने के लिए दर्शन आतुर था। चरित्र अपनी पवित्र-धवल चादर फैलाए मचल रहा था, और... योगानुयोग पूज्य प्रवर्तक गुरुदेव श्री सूर्यमुनिजी म.सा. का संवत् 2010 का चातुर्मास भी‍ थांदला ही तय था। इस वर्षावास के पूर्व ही आपका दृढ़ निश्चय हो गया था कि, चाहे जितना समय गृहस्थावस्था में रहूँ या वैराग्य अवस्था में, लेकिन संयम की एक ही घड़ी महा-‍िनर्जरा का हेतु बनती है। और मुझे तो दीक्षा लेना ही है, फिर यह विलंब क्यों? कब तक?'

प्रशस्त प्रव्रज्या पथ का अनुयायी परम पद पाने के लिए लालायित है, उसने पूर्णत: जान लिया है कि संयम आत्मा को सर्वोच्च शिखर पर पहुँचाने वाली शुभ-प्रवृत्ति है, सत् संकल्प है। उन्होंने इस बार प्रत्यक्ष रूप से पितामह, पिताजी एवं माताजी के समक्ष दीक्षा-ग्रहण हेतु आवश्यक 'अनुज्ञा' की याचना की। परिजनों ने भी सोचा- हमने हर तरह से परीक्षा लेकर देखा है।

अब ये संसार के बंधनों में नहीं रह सकते। इन्हें हमारे मोह के बंधन नहीं रोक सकते। इनका जन्म केवल 'घोड़ावत-कुल' के लिए ही नहीं, थांदलावासियों के लिए नहीं, अपितु जिनशासन को गौरवान्वित करने के लिए हुआ है। मोह और ममता पर इनके वैराग्य ने विजय प्राप्त कर ली है। इस विजयोपलक्ष में अनुज्ञा रूपी माला उन्हें पहना दी। और अब तो उनका मन, उनके चरण सबकुछ मानो कह रहे हो-

गमन-आतुर चरण जाने को, गमन करना गमन करना।
नहीं भाता जरा उनको, कहीं क्षण के लिए रुकना।।

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