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संवत् 2010 की बात है, एक
बार उमेश को बुखार आ गया, कई दिन तक बुखार नहीं उतरा। चिकित्सा चल
रही थी, फिर भी कोई असर नहीं हुआ, तो मैना बुआजी (श्रीमान मैनाबाई
तलेरा, थांदला) ने मुँह में औषधियुक्त तुलसी का रस डाल दिया। ज्योंहि
उमेश को गंध और स्वाद आया, तो नाराज होकर घर वालों से कहने लगा-
'मैना बुआजी को मत आने दो!
यह दोषपूर्ण चिकित्सा करती है।'
आज हम देखते हैं कि
स्वास्थ्य-सुधार हेतु नाना-प्रयासों में व्यक्ति स्वयं का ही ध्यान
रखता है, जैसे भी हो मैं स्वस्थ हो जाऊँ। उसे सदोष-निर्दोष चिकित्सा
का ध्यान ही नहीं रहता है। लेकिन उमेश का मन तो वैराग्य और धर्म के
रंग में रंग चुका था। तभी शारीरिक अस्वस्थता में भी सदोष-चिकित्सा का
पूर्णत: सजग रहकर विरोध किया!
ऐसा ही एक अन्य प्रसंग बना। छुट्टियों में मामा के घर लिमड़ी (पंचमहल)
गया था- उमेश। बचपन में भी उसकी समझ आम बच्चों जैसी नहीं, कुछ 'खास'
थी। तब तक जीव-अजीव के स्वरूप को भी अच्छी तरह से समझ लिया था। एक
दिन मामी सा. श्रीमती कंचनबाई झामर, जब कपड़े धोने हेतु नदी पर गई,
तो वो भी उनके साथ हो गया।
देखा- मामीजी वस्त्र धोकर
बाहर नदी के किनारे निचोड़ रही थी। यह दृश्य देख तत्काल उनसे कहा- 'मामीसा!
ईं कपड़ा बारने मत निचोड़ो। नदी में निचोड़वासे तो कम-से-कम पानी रां
जीव पानी में (योनि स्थान) तो रेगा।' (मामीजी! इन कपड़ों को बाहर मत
निचोड़ो। नदी में ही निचोड़ोगे तो कम-से-कम पानी के जीव पानी में तो
रहेंगे।)
घटना छोटी-सी है, लेकिन मन को झकझोर देती है। उस उम्र में भी कितनी
यतनामय दृष्टि! हर समय यही ध्यान रहता कि हिंसा के दोषों से दूर रहूँ
और अधिक-से-अधिक जीवों की यातना के साथ रक्षा करूँ!
मामीसा, ने ऐसी बात पहले सुनी नहीं थी। सुनकर वे भी नतमस्तक हो गई,
उमेश की जीव-दया की भावना के आगे! और देखने लगी एक महान विभूति को
जो उमेश के भीतर विराजमान थी।
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