गुरु चरणों में अवसर की प्रतिक्षा

संवत् 2005 में कविवर्य पूज्य गुरुदेव श्री सूर्यमुनिजी म. इंदौर में विराजमान थे। उमेश को तो पहले से ही पता था, अत‍: सीधे पहुँच गया- गुरु चरणों में। असमय में उमेश को देखकर सभी को आश्चर्य हुआ! उमेश ने सभी को विधिवत् वंदना कर गुरुदेव के श्रीचरणों में बैठकर आने का प्रयोजन सुना दिया- 'गुरुदेव! अब मैं आपके सानिध्य में रहने के लिए आया हूँ।' सुनते ही गुरुदेव को आश्‍चर्य हुआ, क्योंकि वे जानते थे कि उमेश को सहज ही अनुमति मिलना मुश्किल है।

अत: उमेश से कहा- 'तुम परिवार वालों की आज्ञा लेकर आए हो या भागकर आए हो?' उमेश ने सविनय कहा- 'गुरुदेव! आपसे कुछ भी छुपा नहीं है। मेरे लिए परिवार वालों की आज्ञा प्राप्त करना टेढ़ी खीर है। लेकिन अभी तो मैं माताजी की आज्ञा लेकर आया हूँ। आप निश्‍चिंत रहिए।' गुरुदेव भी आश्वस्त हुए। स-वात्सल्य उन्होंने उमेश को आशीर्वाद देते हुए कहा- 'वत्स! शुभ कार्या में तो बाधाएँ आती ही हैं। लेकिन मुक्ति के महा-पथ पर तो पराक्रमी जीव ही जा सकते हैं। तुम अपने पराक्रम में प्रमाद मत करना!'

'तहत्ति' कहकर गुरुदेव के वचनों को उमेश ने स्वीकार किया। अब जन्मभूमि से विदा लेकर गुरुरूपी कल्पवृक्ष की छाया में रहकर हमारे चरितनायक उमेश से 'वैरागी उमेशचंद्र' बन गए और गुरु-चरणों में रहकर वैराग्य भावों को सम्यकज्ञान के द्वारा पुष्‍ट करने लगे। ज्ञान प्राप्ति की इच्छा शक्ति सुदृढ़ थी, अत: गुरु भ्राता पू. श्री रूपेंद्रमुनिजी म.सा. के लिए जब पंडितजी संस्कृत पढ़ाने के लिए आते थे, तब वैरागी उमेशचंद्र भी पढ़ने बैठते थे। एक सार्वजनिक वाचनालय से किताबें लाकर पढ़ते थे।

बड़े-बड़े ग्रंथ भी दो-तीन दिन में पढ़कर लौटा देते थे तो स्वयं लाइब्रेरियन भी चकि‍त हो जाता था। दीक्षित होने के पूर्व ही आपने हिंदी, संस्कृत, प्राकृत आदि भाषाओं का तथा धर्मशास्त्रों एवं ग्रंथों का अच्छा अभ्यास कर लिया था। संस्कृत में आपने बनारस की प्रथमा एवं कलकत्ता की काव्य-मध्यमा तथा हिंदी में हिंदी साहित्य सम्मेलन प्रयाग की साहित्य-रत्न परिक्षाएँ उत्तीर्ण कर ली थीं।

ज्ञान-ध्यान में तो वृ‍‍‍द्धि हो रही थी, लेकिन भोजन-समस्या बनी रहती थी। उस समय इंदौर में न तो सेवा-सदन था, न अन्य कोई व्यवस्था थी। परिवार वाले भी नहीं चाहते थे कि आप किसी के घर खाना खाने जाए। उनकी ओर से प्रतिबंध तो था ही और प्रतिदिन बाहर का खाना, आपके त्यागी-वैरागी मन को कैसे रास आता? इस समस्या का समाधान भी आपने ही खोज लिया। थांदला के एक मित्र श्री जीतमलजी पोरवाड अध्ययन हेत‍ु इंदौर में मंदिर का एक कमरा किराए पर लेकर रहते थे। आप भी उनके साथ रहने लगे। जिस कमरे में रहते थे, वहाँ रसोई बनाने के कुछ साधन जुटाकर दोनों ने खाना बनाना प्रारंभ किया। रसनेंद्रिय पर विजय तो प्रारंभ से ही था। 'साधक को जीने के लिए खाना है, न कि खाने के लिए जीना है' - इस सूत्र को सिर्फ पढ़ा ही नहीं, ह्रदयंगम भी किया था।

अत: जैसे-तैसे दोनों की रोटियाँ बना लेते, कभी केले के साथ तो कभी पपीते के साथ खा लेते। सब्जी की जगह मसूर की दाल बनाते। क्या उन्हें मसूर की दाल पसंद थी? स्वाद के लिए तो खाना ही नहीं था। साधक के लिए क्या तो पसंद और क्या नापसंद? बस, मसूर की दाल जल्दी सीझ जाती थी, जिससे समय की बचत हो सके और बचा हुआ समय ज्ञानाराधना में उपयोगी हो- यही उद्देश्‍य था। कभी होटल से पुडि़याँ लाकर दूध के साथ तो कभी सुबह की रोटी शाम को खाकर, तो कभी मूँगफली खाकर ही उदरपूर्ति कर लेते थे। जब जीतमलजी की पढ़ाई पूर्ण हुई, उन्होंने कमरा छोड़ दिया और वे न्यूजीलैंड में बस गए। तो कल्याणपुरा निवासी श्री बाबुलालजी सुराणा ने लिए हुए किराए के कमरे में उनके ही साथ एक वर्ष तक रहे।

ब्रह्मचर्य-पालन, जमीकंद-त्याग, रात्रि-भोजन त्याग, प्रतिदिन नवकारसी, पाक्षिक उपवास आदि‍ नियम आजीवन के लिए ग्रहण कर लिए थे। उपवास के पारणे में जहाँ लोगों के लिए गुंदराब उकाली, मूँग, पापड़, धनिए का दूध ‍आदि सामान्य द्रव्य हैं, वहीं वैरागी उमेशचंद्र प्राय: दूध से ही काम चला लेते थे।

परिवार संपन्न होते हुए भी आर्थिक-समस्या बनी ही रहती थी, क्योंकि पारिवारिकजनों के मनोविरुद्ध कदम उठाया था। अत: पारिवारिकजन यही चाहते थे कि समस्या होगी तो अपने आप घर चला आएगा। लेकिन महानगरों का भ्रमण भी आपको भ्रमित नहीं कर सका तो इंदौर में रहते हुए स्थान और अर्थाभाव की स्थिति आपको कैसे विचलित करती? चट्‍टानी इरादें कभी कमजोर नहीं हुआ करते। तमाम प्रतिकूलताओं के बीच संघर्ष करते हुए अपने लक्ष्य तक पहुँच ही जाते हैं। लंबे समय तक संघर्षों का सामना करते-करते आप में सहन शक्ति का संचार हो गया था।

पिता-पुत्र के बीच सेतु का कार्य भाई सा. ही करते रहे। एक बार ऐसा ही कुछ उन्होंने लिखा होगा, तो आपने उन्हें जो जबाब दिया, वह आपके स्वाभिमान, दृढ़ संकल्प, अनासक्ति और बाधाओं को पार करने की मानसिक तैयारी के साथ है- देखिए- यथावत्....

इंदौर 17/4/1950
'पूज्य भाई सा.
सादर प्रणाम !


आपका पत्र मिला। आपकी इतनी सहानुभूति पाकर अनुग्रहित-धन्य हूँ। मेरे जीवन के सही उद्देश्यों पर भी यदि प्रकाश डाल देते तो और भी आभारी होता। पर कृपया याद रखिएगा कि मनुष्य के अंतर में पैठे बिना उसके उद्देश्यों का पता नहीं लगता। बाहरी स्थिति फेनिल होती है। कुछ उलझी-सी जो कि सही मूल को बताने में रपटन बाधक है। अस्तु, जिसका अनुभव आपको भी है...

....मैंने व्यवस्था के लिए गत पत्रों में खुलासावार लिखा है और अब भी लिखता हूँ, मुझे अन्य किसी व्यवस्था की जरूरत नहीं है- अर्थ व्यवस्था को छोड़कर। यदि उसके लिए भी नकारात्मक स्पष्ट उत्तर हो जैसा कि आपने लिखा है- तो भी मुझे दु:ख नहीं।

रही परिवार के दु:ख की बात। जहाँ अपनत्व है वहाँ दु:ख भी। इसके लिए मैं दोषी नहीं।

पिताजी, माताजी, बासाब आदि के चरणों में प्रणाम। यहाँ से मुनियों का धर्माशीष। कृपा बनी रहे।

भवदीय अनुज
'उमेश जैन'


और कहते हैं, जिनशासन की सेवा करने वालों की भी कमी नहीं है। शुभ कार्यों में विघ्न तो आते हैं, लेकिन उन बाधाओं से पार होने के लिए मार्ग भी मिल जाता है। उमेश की भी ऐसी स्थिति देखकर सारंगपुर वाले श्रीमान छोटूलालज‍ी लोढ़ा, उस समय इंदौर में ही रहते थे। वे आपका बहुत ध्यान रखते थे। लगभग एक वर्ष तक उनके यहाँ पर ही भोजन किया। श्री नरेंद्रजी की दादीजी श्रीमती लक्ष्मीबाई का उमेश के साथ माता जैसा ही व्यवहार था।

'दीक्षार्थी को सहयोग देना' उसके संयम भावों की अनुमोदना ही‍ है एवं वैरागी का ज‍ीवन बनाने में सहायक है- यह उन्होंने समझा था। आजकल तो वैरागी-वैरागण बारीवालों के यहाँ खाना खाने जाए, तो यहाँ तक पूछ लेते हैं- 'क्या त‍ुम्हें माता-पिता नहीं हैं? क्यों दीक्षा ले रहे हो?' वे यह नहीं जानते कि संयम के महामार्ग पर विरली आत्माएँ ही चल सकती हैं। चाहे अमीर हो या गरीब, परिवार हो या न हो, लेकिन चारित्र मोहनीय कर्म के क्षयोपशम बिना संयम-ग्रहण की भावना नहीं होत‍ी। और पूर्वोपार्जित पुण्योदय से जिनकी भावना दीक्षा लेने की होती है, ऐसे दीक्षार्थियों की अनुमोदना भी कर्म-निर्जरा का हेतु है। लोढ़ा परिवार के सदस्य भी इस बात को जानते थे। अत: बहुत ही स्नेह के साथ अपने घर का ही एक सदस्य मानकर आपको सहयोग देते थे।

इधर जब कभी माताजी दर्शनार्थ आती तो, चुपके से कुछ रुपए थमा जा‍ती या किसी परिचित के साथ भेज देती थी। उन्हीं रुपयों से बचत करते-करते काम चल जाता था। जब पिताश्री को इस बात का पता चलता, तो वे भी पत्नी पर झल्लाते थे- 'तुमने ही उसकी भावनाओं का पोषण किया है!' तब माता नानीबाई अपने पति से कहती- 'पतिदेव! जब से वह गर्भ में आया, तभी से आप उसके लक्षणों से परिचित थे। आपने ही तो कहा था कि इसमें कुछ विशेषता नजर आ रही है।'

रिखबचंदजी : 'हाँ, विशेषता तो मुझे नजर आ ही गई थी। पर मैंने यह नहीं सोचा था कि यह साधु ही बनेगा।'

नानीबाई : 'महापुरुष भले ही किसी 'कुल' में जन्म लेते हों, लेकिन उनका नाम तो बाहर ही विस्तार पाता है। बड़े-बड़े तीर्थंकर, चक्रवर्ती, सेठ-साहूकार भी गृह-त्याग करके संयमी बने, तभ‍ी तो उनका कल्याण हुआ।'

रिखबचंदजी : 'तुम तो उसके कल्याण पर तुली हो। मैंने तो सोचा था कि इसकी पुण्यवाणी के पावन पगलिए हमारे यहाँ रहेंगे, तो हमारी प्रति‍ष्ठा में भी वृद्धि होगी।'

नानीबाई : 'पतिदेव! जहाँ कहीं रहे वह, नाम तो आपका होने वाला ही है। फिर आप क्यों अंतराय दे रहे हो?'

रिखबचंदजी : सारा धर्म-कर्म तुम ही समझती हो। धर्म में अंतराय कहाँ दे रहा हूँ मैं? भले करे घर में रहकर धर्म।' (नानीबाई ने सोचा- पतिदेव मोहाभिभू‍त हैं, इसलिए ऐसी बाते कर रहे हैं। इस समय उन्हें कुछ कहना अनुचित है। अत: इस समय मेरा मौन रहना ही उचित है)

- ऐसा चिंतन कर वे उस समय मौन हो जाती थी।

सच में, मोह ऐसी धुँध होती है, जो आत्मा पर आवृत्त होकर यथार्थ को व्यक्त नहीं होने देती है, जिससे चेतना के चक्कर यथार्थ की ओर लगे रहते हैं- यही तो जन्म-मरण के गति चक्र का मूल रहा हुआ है। उसी को मिटाने के लिए एक साहस भरा कदम उठाया गया था- उमेश ने। और मोह की वजह से परिवार की ओर से अंतराय आ रही थी। इसी मोह के वशीभूत होकर एक दिन पिताजी ने गुरुदेव श्री सूर्यमुनिजी म.सा. से संवत् 2005 में ही थांदला में ( आपके इंदौर आने के पूर्व) कह दिया था- आप सोच रहे होंगे कि 'अब उमेश को मैं दीक्षा की आज्ञा जल्दी दे दूँगा, लेकिन मैं पाँच वर्ष तक की आज्ञा देने वाला नहीं हूँ।' तब गुरुदेव ने भी शांति के साथ उत्तर दिया-

'श्रावकजी! आप सोच रहे हो, मुझे शिष्य का मोह है। लेकिन आपका यह सोचना गलत‍ है। पाँच वर्ष ‍आपके, तो छठाँ वर्ष मेरी ओर से मान लेना।' गुरुदेव के स्पष्ट शब्दों से पिताजी निरुत्तर हो गए थे।

संवत् 2009 में सादड़ी में साधु-साध्वी सम्मेलन था, तब वैराग‍ी उमेशजी ने गुरुदेव के साथ दीक्षार्थी के रूप में विहार का अनुभव किया। अब तो संयम-साधना से सिद्धत्व को पाने की इच्छा सशक्त और सुदृढ़ बन चुकी थी। परीक्षा की ‍घड़ियाँ रंग ला रही थी और अवसर ही मानो उसकी प्रतीक्षा कर रहा था....।

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