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किरमिची रंग के समान
दीक्षा के दृढ़ संकल्प ने साहस को जन्म दिया। सोच लिया उसने कि- 'अब
मुझे ये बाधाओं के बादल रोक नहीं पाएँगे- न रोक पाएँगे ये मोह-ममत्व
के पथरोड़े। मेरा मन विहग निर्बंध निराकार आकाश में उड़ान भरने के
लिए मचल रहा है। मैं जाऊँगा- अवश्य जाऊँगा, हरगिज नहीं रूक पाऊँगा।
पाऊँगा उस शाश्वत सत्य को और जीवन के तथ्य को। मेरी यात्रा उस बिंदु
पर समाप्त होगी, जब मेरी आत्मा कैवल्य-ज्योति से परिव्याप्त हो जाएगी।'
यंत्र-चलित-सी चलने वाली देह के भीतर उछलता व |