विफल रही प्रयासों की पराकाष्ठा

एक दिन विचारों की गहन घाटियों में उतरकर पिताजी ने सोचा- पुत्र की शाश्वत सुख की आशा हमें हताश एवं निराश न बना दे। इस भय से भीत बनकर उन्होंने अपने लाड़ले पुत्र को पाश्चात्य संस्कृति और भौतिकता से सुसज्ज महाराष्‍ट्र की राजधानी बंबई में थांदला के ही परिचित परिजन श्री कुसुमकांतज‍ी जैन के यहाँ कुछ समय के लिए रखने का मानस बनाया। श्री कुसुमकांतजी स्वतंत्रता सेनानी थे। संभवत: शासन ने उन्हें जिला बदर कर रखा था। अत: वे बंबई चले गए थे। रमेशजी रतलाम रहे।

भार‍त स्वतंत्र हुआ, उस समय डॉ. अम्बेडकर की अध्यक्षता में संविधान निर्मात्री सभा बनाई गई। कुसुमकांतजी उसमें सबसे कम वय के सदस्य थे। उस समय संवत् 2004 में कविवर्य, प्रवर्तक पू. गुरुदेव श्री सूर्यामुनिजी म.सा. का चातुर्मास भी थांदला में था। अत: पिताज‍ी को भय भी था कि अति निकटता कहीं इसके वैराग्य भावों को पुष्ट न कर दें। अत: उनके सानिध्य से दूर रखकर उमेश की वैराग्य-लालिमा वे नि:शेष करना चाहते थे। वे सोचने लगे कि महानगरी की भौतिकता में उलझकर उमेश 'दीक्षा' की बात भूल जाएगा।

लेकिन कहा भी है- 'जो जाँहि के मन बसे, तो ताँहि के पास' उमेश को बंबई भेजा गया। तन से उमेश बंबई में था, लेकिन मन से तो मुनित्व भावों के करीब ही था। उसके लिए थांदला और बंबई में कोई अंतर नहीं था। बंबई में चार माह का समय अर्थात् एक चातुर्मास-काल व्यतीत किया। बंबई के कांदेवाड़ी क्षेत्र में पू. श्री किशनलालजी म., मालव केसरी पू. श्री सौभाग्यमलजी म.सा. विराजमान थे। कभी-कभार वहाँ भी जाता था, लेकिन कुसुमकांतजी के घर से काफी दूर होने से रोज संभव नहीं था।

अत: श्री कुसुमकांतजी के ऑफिस में कुछ लिखने का कार्य है तो वह करना, नहीं तो कुछ पत्र-पत्रिकाएँ पढ़ना, कुछ लिखते रहना। ऐसे ही समय बिताता था। श्री कुसुमकांतजी के एक मित्र थे। वे फौजदार थे- उनका कुसुमकांतजी के यहाँ आना-जाना बना रहता था। उमेश का भी उनसे परिचय हो गया। वे सिनेमा-गृह के कार्यों से जुड़े हुए थे, अत: उनके यहाँ‍ हिंदी साहित्य भरपूर था। उनके यहाँ पहुँचकर उमेश साहित्य पढ़ता था।

बंबई में ही श्री ‍हरिवंशराय बच्चनजी का 'निशा-निमंत्रण', मैथिलीशरणजी का 'यशोधरा',, जयशंकर प्रसादजी के चंद्रगुप्त आदि नाटक और भाषा-विज्ञान आदि पढ़े। संतबालजी का 'मुक्ति नां सोपान' (अपूर्व अवसर का विवेचन) पढ़ा और उसका हिंदी अनुवाद भी किया। 'उषा-उत्कर्ष' नाम से कुछ गीत भी बनाए। साहित्य में निमग्न होकर भी उसका वैराग्य यथावत् था, यह हम बंबई से ही पिताजी के नाम भेजे गए, एक पत्रांश के माध्यम से जान सकते हैं-

'पू. पिताजी! आपने मुझे वैराग्य उतारने के उद्देश्य से यहाँ (बंबई) भेजा है। लेकिन मैं थांदला और बंबई में कुछ विशेष अंतर नहीं देखता हूँ। वहाँ भी चूने और ईंटों के मकान हैं तो यहाँ भी चूने और ईंटों के बड़े-बड़े मकान हैं। लेकिन मुझे इससे क्या? मेरा मन तो कहता है कि मुझे बंबई तो क्या विलायत (फॉरेन) भी भेज दो, तो भी मेरे भावों में कोई फर्क पड़नेवाला नहीं है। यहाँ के वातावरण से तो मेरे वैराग्य भावों के अनुकूल ही वृद्धि हुई है और मुझे तो दीक्षा ही लेना है।'

उमेश का बंबई से दीक्षा लेने की दृढ़ भावना की अभिव्यक्ति के साथ पत्र आया तो श्री रमेशजी ने उन्हें लिखा-
'आज देश को साधुओं की नहीं, गाँधी और जवाहर जैसे नेताओं की जरूरत है। तुम अभी भी अपना इरादा बदल लो और अपनी योग्यता का उपयोग सही दिशा में करो। इस समय तो देश अभी-अभी परतंत्रता की बेडि़यों से मुक्त हुआ है। देश के उत्थान के लिए तुम्हारी शक्ति का युक्ति का सदुपयोग हो सकता है। तुम्हें बंबई भेजने का उद्देश्य तो केवल तुम्हारी भावनाओं में परिवर्तन लाना था।'

इस आशय का प्रत्युत्तर पाकर उमेश ने सोचा- भाई सा. ने अपना जीवन देश के उत्थान हेतु लगा दिया है। और एक सच्चा देशभक्त देश के उत्थान के सिवा सोच भी क्या सकता है? ये स्वतंत्रता सेनानी हैं, तो मैं भी स्वतंत्रता सेनानी हूँ। वे देश को मुक्त कराने में प्रयासरत हैं, तो मैं भी आत्मा को परतंत्रता की बेडि़यों से मुक्त करना चाहता हूँ। गोरे अँग्रेजों ने देश पर लगभग 200 वर्ष राज किया और उन्हें जाना पड़ा और देशभक्तों ने तिरंगा लहरा दिया। लेकिन काले कर्मों ने तो अनादि से आत्मा पर कब्जा कर रखा है, उन कर्मों की बेडि़यों से मैं भी अपनी आत्मा को मुक्त करके रत्नत्रय का तिरंगा लहराना चाहता हूँ। और उसने भाई सा. को ऐसा ही प्रत्युत्तर दे दिया।

विषम परिस्थितियों का अभाव उस योगी मन को छू न सका। पारिवारिकजनों के प्रयासों की पराकाष्ठा ‍विफल रही। उसके भीतर साधुत्व स्वीकार करने के लिए जो लावा फूट रहा था। वह बहिर्निष्क्रमण के लिए राह ढूँढ़ रहा था। चार माह बाद जन्मभूमि में लौट आया और इस बार निर्णय की मुहर लगाकार ही कि 'अब मुझे घर में नहीं रहना है। गुरुदेव के सानिध्य में रहकर ही ज्ञानार्जन करना है। क्योंकि जब तक गृहत्याग नहीं होगा, बात आगे नहीं बढ़ेगी, दीक्षा की अनुमति नहीं ‍मिलेगी।'

उसका चिंतन ऊर्ध्वमुखी बना- 'जिसकी खोज मुझे जीवन के अरुणोदय से ही थी, उस स्वप्न को मुझे साकार करना है। अब यह शाश्वत सुख का समुपासक उसकी संप्राप्ति में ही सुखानुभूति करेगा!' ऐसा सोचकर वह अवसर की प्रतीक्षा करने लगा। उसके अंतर के स्वर कविता में मुखरित हो उठे-
सच्चे पथ का बनकर राही, निर्भयता से बढ़ता जाऊँ....
अपना लक्ष्य कहीं दूर नहीं
फिर भी मंजिल अति दूर रही
मजबूती से कदम जमाता, लंबे मग पर चलता जाऊँ।।
यश वैभव की छल छाँह हटा
दैवी-साधन की चाह मिटा
इहभव-परभव में क्या उलझूँ, ऊपर-ऊपर उठता जाऊँ
सच्चे पथ का बनकर राही, ‍‍निर्भयता से बढ़ता जाऊँ।।

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