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सगाई के बंधन से मुक्त होने
के बाद उमेश ने एकांत, आत्म-चितंन और अधिकाधिक धर्म-आराधना से स्वयं
को जोड़ लिया था। इधर माता व्यथा-वारि में डूबी जा रही थी। पिताजी के
मुख-मंडल पर हर समय विषाद की रेखाएँ नजर आती थी। लेकिन परिजनों के
स्नेह सागर की लहरें उसके शांत-मानस को विचलित नहीं कर पाई। उसे तो
बस एक ही धुन थी कि मुझे तो जल्दी ही दीक्षा लेना है। उसे यह तो
ज्ञात ही था कि परिजनों की!माता-पिता की आज्ञा बिना दीक्षा नहीं दी
जाती है। अत: उसके सामने 'दीक्षा की आज्ञा हेतु पिताजी को कैसे कैहे?
- यह एक सवाल था। प्रत्यक्ष बात करने में तो झिझक थी, भय था और संकोच
भी।
बड़ों की मर्यादा का उसे खयाल था। पिताजी तो क्या, बड़े भाई सा. के
साथ हँसी-मजाक तो दूर की बात- यूँ भी विशेष बात नहीं करते थे और
सगाई-प्रसंग के बाद तो संकोच विशेष बढ़ गया था। अत: काफी सोच-विचार
के बाद पिताजी के नाम पत्र लिखा। अब दे तो कैसे दें? प्रत्यक्ष दे तो
चर्चा का विषय होगा। पूछताछ होगी और हेतु सिद्ध होने में बाधा भी आएगी।
अत: हिम्मत नहीं हुई और वह पत्र पिताजी के सामायिक के बेटके में रख
दिया। और इंतजार करने लगा कि नतीजा क्या आएगा? लेकिन पिताजी ने वह
पत्र पढ़कर रख लिया। कुछ तो वे जानते भी थे, उस समय कुछ न कहने में
ही सार समझा। उस पत्र की प्रतिकृति जिज्ञासुओं की जानकारी हेतु यथावत
दी जा रही है-
श्रीमान् पूज्यनीय पिताजी,
के चरणों में मेरा प्रमाण!
थांदला, दीतवार
जिस बात को कहने के लिए मैं डेढ़ साल से छटपटा रहा था, शर्म ने मेरे
गले पर बोझ लाद दिया था अब मैं लिखने का प्रयास कर रहा हूँ।
मैंने सगाई करके आपके जी में एक उलझन डाल दी। मैंने सगाई बल्लू के
देखादेखी कर ली, लेकिन मैं जानता हूँ कि सगाई से कोई सार नहीं। मेरा
चेताने का काम है सो कह देता हूँ कि मेरी इच्छा शादी करने की नहीं
है। नीचे के पद्य द्वारा आपको एक निवेदन करना चाहूँगा-
सुनो पिताजी प्यारे-प्यारे
आज्ञा दो तो संजम आदरे? सुनो पिता.... ।।1।।
बस, इसी बात के लिए चिट्ठी लिखी है।
आपको संयमाभिलाषी पुत्र
उत्सवलाल
इस पत्र में दिनांक नहीं है, लेकिन पत्र की भाषा से सिद्ध होता है कि
पत्र सगाई के बाद का है। इसमें उमेश ने यह स्वीकार कर लिया कि मर्यादा
के कारण पिताजी से दीक्षा के बारे में कुछ न कह सके और अपने मित्र के
देखादेख सगाई भी कर ली। यह जानते है कि सगाई में सार नहीं है, लेकिन
उस समय 12-13 वर्ष की उम्र थी, अत: निर्णय-ग्रहण की क्षमता पूर्णत: न
होना भी संभव है। बड़ों का भय भी निर्णय करने में बाधक बना होगा।
लेकिन तत्काल सँभल भी गए और पत्र में दीक्षा के लिए आज्ञा की याचना
करके शादी न करने का स्पष्ट निर्णय सुना दिया। और सचमुच में सगाई के
बंधन को तोड़कर मुक्तिरूपी वधू का वरण करने के लिए त्याग-वैराग्य के
आभूषणों से स्वयं को अलंकृत कर लिया।
उपरोक्त पत्र के पूर्व का भी एक पत्र जो सगाई-रस्म से काफी पहले लिखा
हुआ था, वह भी प्राप्त हुआ है, जिसे उमेश ने पिताजी के कुर्ते की जेब
में रख दिया था। वह पत्र भी यथावत् निम्न प्रकार से है-
थांदला
21-1-47
श्रीमान पूज्यनीय पिताजी के परम पावन चरण कमलों में,
उमेश का सादर सविनय प्रणाम!
के पश्चात नम्र निवेदन!
पितृवर! मैं आपसे बात करने का मौका देख रहा था। अपनी निजी भावना को
प्रकट करना चाहा पर आपने गोल-मोल जवाब दे दिया। मैंने आपसे आज्ञा
माँगना चाहा पर आपको समय ही नहीं मिलता, आप वैसे भी गाँवड़ों में ही
ज्यादा रहते हो, अत: पत्र द्वारा लिख रहा हूँ।
मैं आपसे आज्ञा की भिक्षा चाहता हूँ। आप मुझमें अन्य बातों की आशा नहीं
करें। चाहे सारी पृथ्वी डूब जाए, चाहे सूर्य-चंद्र-पृथ्वी पर ही आकर
रहे, पर मैं निश्चय से नहीं हटूँगा। दीक्षा लेना ही मेरा दृढ़
निश्चय है, इसलिए मैं संस्कृत ही पढ़ रहा हूँ। आप जैसे विज्ञ, अनुभवी
को क्या कहूँ? मेरी दृढ़ता को पार पहुँचाना आप पर ही निर्भर है। आप
मुझसे सच्चा प्रेम करते हो तो तन-मन से सहायता कर दीक्षा के लिए आज्ञा
की भिक्षा देवें।
नोट- आशा है मुझे आज्ञा मिलेगी। यदि आपने जवाब नहीं दिया तो मैं अपना
कार्य करने के लिए स्वतंत्र हूँ। योग्य सेवा
आपका विनम्र
प्यारा सुत
उमेशचंद्र जैन
इस पत्र से भी हम देख सकते हैं- उमेश की दीक्षा का दृढ़ निश्चय। 'दीक्षा
के लिए भी आज्ञा की भिक्षा' में भी दृढ़ता है। साथ ही पिता के प्रेम
की परीक्षा है और आज्ञा न मिलने पर भी विनम्रता के साथ दीक्षा लेने
की स्वतंत्रता भी अभिव्यक्त की है। सच में, दृढ़-निश्चय के धनी, वो
सब कुछ पाकर रहते हैं, जो वे चाहते हैं।
लेकिन उमेश को तो अभी शेष परीक्षाओं की घाटियों से गुजरकर नि:शेष
करना था- मार्ग की बाधाओं को। अत: हर हाल में तत्पर था- परिस्थितियों
से पार उतरने के लिए और मंजिल को पाने के लिए।
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