सगाई रस्म से गुजरते हुए

'संसार' का बंधन ऐसा बंधन है, जिसमें बँधकर व्यक्ति की कर्म-लीला में वृद्धि होती जाती है। लेकिन फिर भी गृहीजन इसे अपना कर्तव्य मानते हैं। उमेश के परिवार वाले भी इस कर्त्तव्य से मुक्त होना चाहते थे। पुत्र की धार्मिक भावनाओं से माता-पिता अनजान तो नहीं थे। पर उसके भीतर के भाव पूर्णत्व की ओर जाने की तैयारी में है- ऐसा स्वप्न में भी उन्होंने नहीं सोचा था। वे नहीं चाहते थे कि उनकी आकाँक्षाओं का शिखर साधु बनकर- अध्यात्म की राह पर चल पड़े।

जीवन के श्रृंगार को नकार कर सादगीमय साधुत्व स्वीकार कर लें। उन्होंने तो उमेश से कई अपेक्षाएँ सँजो रखी थी। अत: बिना राय लिए ही उन्होंने जोड़ दिया उमेश को उस रिश्ते के साथ, जिसके प्रति आम युवाओं के मन में बहुत उमंगे होती हैं, भविष्य के स्वप्नों में जो खोए रहते हैं और उस बंधन के नाम से ही उनके मन में गुदगुदी पैदा होती है। सच ही कहा है किसी ने कि यौवन समय का अश्वकाल है, उसमें उत्साह, भावोर्मियाँ ओर भावुकता विशेष होती है। सांसारिक बंधन को ही वे जीवन की इतिश्री मान लेते हैं।

पर 'उमेश' का जीवन आम युवाओं से कुछ हटकर था। उसके मुख-मंडल पर स्थितप्रज्ञता के दर्शन होते थे। पर बड़ों के सामने कुछ न कह पाने की झिझक अवरोधक बन गई। दादाजी श्री दौलाजी ने उसकी सगाई थांदला के ही श्रीमान केशरीमलजी भंडारी की जेष्ठ दौहित्री के साथ संवत् 2001 में कर दी। इस घटना ने उन मानसों को भी हिला दिया, जिसके मन में उमेश के प्रति यह धारणा बन चुकी थी कि उमेश तो विवाह रूपी बेडि़यों में फँसना नहीं चाहता है, वह तो दीक्षा ही लेगा। कुछ समय के लिए उन लोगों ने यही समझ लिया कि उमेश का वैराग्य क्षणिक भावों की लहरों पर ही आधारीत था।

इस पारिवारिक मोह का कोहरा यथार्थ को आवृत्त करने का प्रयास लगा और उमेश की भावनाओं को नजरअंदाज कर संवत् 2003, चैत सुदी 5 के दिन रकम चढ़ाने का कार्यक्रम तय हुआ। उमेश की स्थिति विकट थी। क्या करें? कैसे करें? मैं तो गुरु चरणों में समर्पित हो चुका हूँ और मुझे तो दीक्षा ही लेना है। यदि इस समय विरोध नहीं करूँगा, तो सारी रस्मों से गुजरते हुए 'विवाह' के बंधन में भी फँसना होगा। अब कुछ तो उपाय करना होगा। वह चिंतनरत था।

तभी बड़े भ्राता श्री रमेशचंदजी ने उमेशचंद्र की मन:स्थिति को देखा। उन्होंने सोचा, इसे दीक्षा तो लेना नहीं है। जिस लड़की से सगाई हुई है, उससे शादी नहीं करनी होगी- इसलिए नखरे कर रहा है।' वैसे भी रमेशचंद्रजी स्वतंत्रता-आंदोलन में सहभाग के साथ-साथ सामाजिक चेतना से भी प्रभावित थे। वे भी नहीं चाहते थे कि उमेश का विवाह इतनी कम उम्र में हो। बाल-विवाह के वे विरोधी थे। अत: उमेश को दो रुपए देते हुए सलाह दी कि- 'तू अभी झाबुआ भाग जा! बाकी मैं देख लूँगा !'

बस, उमेश को तो संबल मिल गया। मन में दृढ़ निश्चय किया और जिस दिन रकम चढ़ाने की रस्म थी, उसी दिन सुबह एक दृढ़ संकल्प के साथ चल पड़ा। लेकिन कहते हैं, 'श्रेयांसि बहुविघ्नानि'- अच्छे कार्यों में बाधाएँ बहुत आती हैं। ज्यों ही उमेश बस स्टैंड पर पहुँचा, ज्ञात हुआ दो मिनट पहले ही झाबुआ जाने वाली बस निकल गई थी। उस समय दिन में एक ही बस झाबुआ जाती थी। अब पुन: सवाल खड़ा हुआ, क्या किया जाए? सवालों से गुजरती हुई जिंदगी को जवाब भी बाहर से नहीं मिलने वाला था।

भीतर से ही जवाब आया- 'अब न घर जाना है, न रस्मों से गुजरना है। बस, आज का दिन जैसे-तैसे व्यतीत करना है, ताकि मुहूर्त टल जाए!' ऐसा सोचकर गाँव के बाहर स्कूल के पास एक गडढ़ा था, उसमें बैठ गया कि कोई देख न पाएँ। उस समय वहाँ नमस्कार-मंत्र का सतत जाप करता रहा। शाम हो गई। पंछी अपने घोसलों में लौटने लगे, पशु अपने घरों की ओर जाने लगे और कुछ ही देर बाद रात ने भी अंधियारे की चद्दर ओढ़ ली। रात गहराने लगी... हवाएँ सांय-सांय करने लगी। टिटहरियाँ बोलने लगी। जंगल से हिंसक पशुओं की आवाजें आने लगी। रात डरावनी होती जा रही थी।

उमेश का किशोर मन! कुछ हिम्मत थी, तो कुछ भय। सुन रखा था बचपन से कि स्कूल में जो पीपल का वृक्ष है, उसमें पठान भूत रहता है, रात में वह फाँलिया (एक प्रकार का शस्त्र) लेकर घूमता है। जिसे भी देखता है मार डालता है। डर था, फिर भी सोचने लगा- 'भूत आए ओ भले आए। मारेगा, तो मार का लूँगा- पर घर तो हरगिज नहीं जाऊँगा!' बस, उस खड्‍ढ़े से निकल कर स्कूल के ओटले पर आ गया।

इधर घर में तूफान मचा हुआ था- 'उमेश कहाँ गया? किसे कहकर गया?' दादाजी दौलाजी के दाँत नहीं थे। फिर भ‍ी तंबाखू पिसकर रगड़ते थे। उन्होंने भी सुना- उमेश गायब है। सभी ढूँढ़ रहे हैं। कोई कह रहा था- झाबुआ तो नहीं चला गया? तो दादाजी ने दाँत रगड़ते-रगड़ते ही कहा- 'छोरो कई नी गयो। मोटर गई विना बाद तक तो घरेज थो, अईंवईं ‍छ‍ीपी गयो व्हेगा!' (छोकरा कहीं नहीं गया है। मोटर गई उसके बाद तक को घर में ही था। इधर-उधर कहीं छिप गया होगा।)

लेकिन घर के लोगों को चैन कहा? मैना- बुआजी, आपकी बड़ी बहनें एवं कुछ पुरुष कण्डील (लालटेन) लेकर ढूँढ़ने निकले और ढूँढ़ते-ढूँढ़ते आ गए स्कूल के पास। उमेश सजग तो था ही, परिजनों की आवाज, अपनी ओर आते पदचाप सुनकर धड़कन बढ़ गई। असमंजस की स्थिति में है। भागे भी तो कहाँ? तभी किसी की नजर पड़ी- 'वईं देखो- उमेश बैठ्‍यो है। (उधर देखो, वहाँ उमेश बैठा है।) सभी ने उस ओर देखा। राहत की साँस ली। एक ने हाथ पकड़ा जोर से- 'कांई करी रयों यहाँ? चाल घरे!' (क्या कर रहा है यहाँ? चल घर) ना कहने की हिम्मत नहीं। चुपचाप साथ हो गया। घर में भीड़ जमा थी। सभी को कहा गया था- 'उमेश घर आ जाए, तो उसे कोई कुछ कहेगा नहीं।' अत: उमेश के घर आने पर किसी ने कुछ कहा नहीं और वह अंदर जाकर खाट पर मुँह ओढ़कर चुपचाप सो गया। दिन भर से न कुछ खाया- न पिया। लोग बिखर गए। कार्यक्रम निरस्त हो गया।

दादाजी ने दूसरे दिन लोगों में कह दिया- 'छोरां रो दिमाग ठिकाने नहीं, कांई राखाँ सगाई?' (लड़के का दिमाग ठीक नहीं है- क्या रखें सगाई?) लड़की वालों ने यह बात सुनी। उन्हें आघात लगना स्वाभाविक था, लेकिन गाँव में ही होने से उमेश के विरक्त मन के बारे में उन्हें भी पता तो था ही। फिर भी उन्होंने यही सोचकर सगाई की थी, कि हो सकता है कि अत्याधिक धार्मिकता से ऐसे भाव बने हो और धर्म-मर्म समझना वाले सभी तो दीक्षा लेते नहीं।

लेकिन जब रकम चढ़ाने के दिन हर ऐसा प्रसंग बना, तो गाँव में भी बातें होने लगी। पर उमेश को तो इन बातों की परवाह नहीं थी। जिसमें त्रिभुवन के स्वामी बनने की पात्रता हो, वो भला एक का स्वामी बनकर कैसे रह सकता है? दोनों परिवारों में उमेश के इस व्यवहार से नाराजी अवश्य बढ़ी, लेकिन उमेश के मनोबल में तो वृद्धि ही हुई और वैराग्य के भाव भी पुष्ट हुए। इस घटना के बाद थांदला-नगरी में तथा आसपास के परिजनों में भी यह बात फैल गई कि 'उमेश तो दीक्षा ही लेगा।'

इस प्रकार सगाई रस्म से गुजरते हुए भी उमेश की पूर्व पुण्‍योपार्जित धर्म-श्रद्धा और वैराग्य दृढ़ हुआ और मनोवां‍छित की प्राप्ति हेतु वह अधिक तत्पर बन गया।

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