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बचपन से ही बालक उमेश को चाय के साथ पराठा खाने की
आदत थी।
एक दिन भी चाय के बिना नहीं चलता था। साथ ही जब उसके
वैराग्य एवं दीक्षा की भी चर्चा चलती थी, तो एक दिन माताजी ने सहज ही
कह दिया-
'चाय तो छूटा नी, ने कांई दीक्षा लेगा?' (चाय तो छूटती
नहीं, क्या दीक्षा लेगा?) स्वाभाविक था, वचनों का प्रभाव हुआ। उमेश
ने सोचा- 'सच ही तो है। चाय की आदत तो आगे दुखदायी ही होगी। अच्छा
हुआ, जो मेरी माताजी ने मुझे चेता दिया। आज से चाय बंद!' और उस दिन
से उमेश ने चाय न पीने का संकल्प कर लिया। लगभग संवत् 2003 की बात
है।
आखिर माँ की ममता जो ठहरी, वे सोचने लगी- 'मेरे कहने से इसने चाय पीना
छोड़ दिया। हो सकता है, उसके मन को चोट पहुँची हो।' उन्होंने यह बात
घर की वृद्ध महिलाओं (भुआजी आदि को) कहीं, तो उन्होंने उमेश को डाँटते
हुए कहा- अतरो गुस्सो! जरा-सी बात में चाय छोड़ दी। ऐसो गुस्सो करेगा
तो कांई दीक्षा लेगा?' उमेश ने सोचा- 'कैसी है यह दुनिया? मुझे तो सच
में दीक्षा ही लेना है, इसलिए मैं अपनी आदत छोड़ना चाहता था और
इन्होंने मेरी त्याग-भावना को गुस्से से जोड़ दिया। खैर... 'सच ही कहा
है-
जह सलिलेण ण लिप्पई, कमलिणि पत्तं
सहाव पयडीए।
तह भावेण ण सिप्पई, कसाय विसएहिं सप्पुरिसो।
जैसे कमलिनी का पत्र स्वभाव से ही जल से लिप्त नहीं
होता, वैसे ही सत्पुरुष सम्यक्त्व के प्रभाव से कषाय वौर विषयों में
लिप्त नहीं होता।
और उन सबका मन रखने के लिए एक बार पुन: उसे चाय पीनी पड़ी। इस प्रसंग
से हम समझ सकते हैं कि जिसके मन में त्याग की उत्कृष्ट भावनाएँ पनप
रही हो, उसके लिए भौतिक पुद्गलों का त्याग करना कठिन नहीं है। साथ
ही पुन: चाय भी पी तो सिर्फ 'त्याग में गुस्सा नहीं होता' इस धारणा
को दृढ़ रखने के लिए ही। महिलाएँ भी फिर कुछ नहीं बोली और उमेश के
लिए तो ऐसे कई प्रसंग वैराग्य दृढ़ करने के लिए वरदान रूप साबित हुए
और अब उसकी जिनवाणी का पान करने की प्यास बढ़ती ही जा रही थी।
वह गुरु-चरण रूपी पनघट पर समर्पित होकर भव-बंधनों से मुक्त होने की
प्यास बुझाना चाहता था। हाँ, प्यासा व्यक्ति ही तो पनघट की खोज करता
है। उसे भी खोज थी ऐसे ही पनघट की जो उसकी भव-भव की प्यास मिटा
दे....
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