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थांदला के सुश्रावक श्री गेंदालालजी रुनवाल रहते थे,
जो बाद में मेघनगर में बस गए। उनकी धर्म-आराधना उत्कृष्ट कोटि की थी।
दीक्षा लेने में असमर्थ होते हुए भी आपका सांसारिक जीवन भी बहुत
संयमित था। श्रावक के 12 व्रत, चारों स्कंध के धारक गेंदालालजी वर्ष
में दो बार लोच भी करते थे।
जब गेंदालालजी को उमेशचंद्र के दीक्षा के भाव मालूम हुए तो उन्होंने
लोच के समय उसे बुला लिया एवं लोच करने की प्रेरणा दी। प्रारंभ में
तो डर लगता ही है, वैरागी उमेश ने भी डरते-डरते लोच शुरू किया। और
थोड़ा-थोड़ा करते-करते लोच करना सीख लिया। स्व. गेंदालालजी के 2-3
लोच किए। इस प्रकार लगभग 16-17 वर्ष की छोटी-सी उम्र में ही लोच करना
भी आ गया।
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