समर्पण के सुनहरे पल

योग और भोग के द्वन्द्व का मध्यबिंदु बन चुका था- उमेश। वह उम्र से किशोर था, पर प्रज्ञा दृष्‍टि से प्रौढ़त्व को पा गया और पाना चाहता था। गुरुचरणों में दुनिया की सबसे ऊँची ‍मीनार जिसे पाकर कुछ पाना शेष ना रहे। समर्पित होने के लिए मन आतुर था और वे समर्पण के सुनहरे पल भी मनोकामना पूर्ति हेतु प्राप्त हो गए।

कविवर्य पूज्यपाद श्री सूर्यमुनिजी म.सा. का संवत् 2002 में लिमड़ी चार्तुमास तय था। वर्षावास हेतु घोषित स्थान पर पहुँचने के लक्ष्य से पूज्य श्री का शिष्य मंडली के साथ थांदला में पदार्पण हुआ, मानो सूरज चलकर घर आया हो। उमेश की भावनाओं को आधार स्तंभ प्राप्त हो गया।

देखा-आत्मानंद का दिव्य अमृत निर्झर! सरस-सुखद मधुर! मधुरिमा-गरिमा-महिमा की त्रिवेणी से आध्यात्मिकता की कृपामृत-वृष्‍टि से प्राप्त बौछारों से अंतरमन भींग उठा। नेह का पावन स्पर्श पाकर अंतरात्मा रोमांचि‍त हो उठी। उस दिव्य कलाधर की रश्मियों के संस्पर्श से उमेश की ज्ञान किरणें भी प्रभावित बनी। उसका तो लक्ष्य निर्धारित था ही, संसार के बंधनों से मुक्त होकर जीवन को ऊर्ध्वगामी मोड़ देकर अनंत शाश्वत सुख को पाना है, तभी गुरुवर श्री की अंतर्वेधी दृष्‍टि ने भी दिल के द्वार पर दस्तक दी-

'उठो! जागो! निजत्व से जिनत्व की ओर अग्रसर होना चाहते हो, तो मानव जीवन नौका के समान है। उस नौका पर आरूढ़ होकर सम्यक् दिशा में गमन करने पर ही तुम अप्राप्य को प्राप्त कर सकते हो।'

अंतर्ह्रदय तक आवाज पहुँची। नेहमयी दृष्‍टि पाकर वि‍नीत स्वर मुखरित बने- 'भगवन्! आज मेरा भाग्य का सूरज चलकर मेरे ह्रदय-द्वार आया है। मैं स्वयं आपश्री के चरणों में समर्पित होकर मानव-भव के चरम और परम लक्ष्य को पाना चाहता हूँ। मुझे शिष्य रूप में स्वीकार कर अनुग्रह करें
भगवन्!' उसने सद्‍गुरु के चरणों में अपनी भव्य-भावना काव्य रूप में भी प्रस्तुत की-

कई जा चुके प्रशस्त पर, अब मुझे भी बुला लो...
चेतन से निकले भव्य, जिससे हो जीवन दिव्य
उस गाने में मेरी भी मानस आवाज मिला लो....

कर-कर सबका आह्वान, कराया रसामृत पान
अब मुझ प्यासे के मुख में भी थोड़ी बूँद गिरा दो...

पावन ज्ञान ज्योति अमर, जहाँ पता न कहाँ कहर
इन अत‍ृप्त नयनों में भी, झाँकी वह दिव्य बसा दो...
कई जा चुके प्रशस्त पर, अब मुझे भी बुला लो।।

गुरुदेव के अनायास प्राप्त शिष्य लाभ से प्रमुदित होकर कहा- 'वत्स! तुम्हारी भावना सफल होगी। समय आने पर ही फसल पकती है। तुम्हारे लक्ष्य प्राप्ति में अभी कुछ समय है। बस, दृढ़ रहकर धर्म-वृद्धि करते रहो। पुरुषार्थ करते रहो। सफलता तुम्हारा वरण करेंगी।' पूज्य श्री ने आंतरिक-आशीर्वाद दिया। वैराग्य से परिपूर्ण संयम के बीज को सरसाया-सहलाया और विहार कर गए।

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