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झाबुआ जिले में मच्छरों की अधिकता के कारण
मलेरिया-ज्वर का प्रमाण कुछ विशेष ही है। उमेश को बचपन में कई बार
मलेरिया होता था। कुनेन की गोलियाँ खानी पड़ती थी। कभी-कभी इंजेक्शन
भी लगाने पड़ते थे।
किशोर-अवस्था में उसने एक बार उपवास-चिकित्सा के बारे में पढ़ा था।
घर में धर्म-संस्कार तो थे ही। अत: चातुर्मास-काल में परिवार के
सदस्य यदाकदा (पक्खी, अष्टमी आदि) उपवास कर लेते थे।
उमेश ने सोचा- 'हमारी धर्म-आराधना त्याग-तप आदि आत्मा के लिए तो है
ही, लेकिन शरीर के लिए भी हितकारी है। ' अत: तबसे उमेश ने चातुर्मास
में तीन बार उपवास करना प्रारंभ किया। चातुर्मास बैठे तब, पर्युषण के
प्रारंभ में और संवत्सरी के दिन। उमेश से उपवास होना मुश्किल था।
कभी-कभी उल्टियाँ भी हो जाती थी। लेकिन धर्म-आराधना में दृढ़ रहने का
संकल्प उसे कैसे डिगा सकता था?
और इस तपस्या का प्रभाव भी ऐसा रहा कि कई वर्षों तब उसे बुखार नहीं
आया।
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