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उमेश की धर्म श्रद्धा तो
दृढ़ थी ही, लेकिन यह भी पता था कि दीक्षा की आज्ञा के लिए पारिवारिक
विघ्न आनेवाले हैं। जमींदार जैसा प्रतिष्ठित-संपन्न परिवार था।
परिजनों का अपार स्नेह प्राप्त हो रहा था, जो उसके शुभ मार्ग में
बाधक बन रहा था। कुछ प्रयास भी किए, लेकिन सफलता नहीं मिली।
और व्यक्ति जब उद्देश्य में सफल नहीं होता है, तो कई प्रकार के
विकल्प मन में उठते हैं। उमेश भी परेशान हो गया। क्या किया जाए?
उस समय स्वतंत्रता आंदोलन चल रहा था। बड़े भ्राता श्री रमेशचंदजी
स्वयं स्वतंत्रता सेनानी थे। उधर प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी मामा
बालेश्र्वरदयाल दीक्षित जो कि धर्मदास जैन विद्यालय के प्रधानाध्यापक
भी थे, आदिवासियों के सुधार के लिए प्रयासरत थे।
इन सब परिस्थितियों को देखते हुए उमेश के मन में भी क्षणिक विचार आया
कि यदि प्रयास करने के बावजूद भी दीक्षा की आज्ञा नहीं मिल पाई तो इन
आदिवासियों के नैतिक/चारित्रिक/शैक्षणिक विकास में अपना ध्यान दूँगा।
क्योंकि आदिवासी आसामी भी जब घर पर आते या कभी मिलते, तो उमेश को कहते-
'सेठ तु आव, अमारा पोर्याने भणाव' (सेठ तुम आजो, हमारे बच्चों को
पढ़ाओ।)
लेकिन उस समय उमेश यह अच्छी तरह से जानता था कि संयम की एक घड़ी भी
विपुल कर्म-निर्जरा का हेतु बनती है। अत: पूर्णत: प्रयास तो दीक्षा
की आज्ञा पाने में ही था। फिर भी आदिवासियों के उत्थान की उदात्त
भावना और आदिवासियों के मन में उमेश के ज्ञान का बहुमान/उससे पढ़ने
की ललक इस प्रसंग में देखी जा सकती है।
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