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उमेश की उम्र उस समय लगभग
चौदह वर्ष की होगी। उसे पता चला कि घर के पास ही एक विधवा रहती थी।
उसको उसके पति आते थे अर्थात् उसके शरीर में दैवी शक्ति का संचार होता
था और लोग उससे कई प्रश्नों के सामाधान पाते थे। उमेश के मन में भी
कुतूहल जाग्रत हुआ। कुछ प्रश्न पूछने की भावना से निर्धारित समय पर
वहाँ पहुँचा। भीड़ जमी थी। लोग-बाग सवाल पूछ रहे थे। उमेश ने भी
निवेदन किया- 'मैं कुछ पूछ सकता हूँ?' लोगों ने कहा- 'हाँ! हाँ! पूछो
न!' फिर प्रश्न प्रारंभ हुए-
उमेश : क्या आप कभी सीमंधर
स्वामी के दर्शन करने गए?
बहन : हाँ, गया।
उमेश : क्या मेरी भावना पूर्ण होगी?
बहन : यदि तू दृढ़ रहेगा तो अवश्य पूर्ण होगी।
(उमेश ने मन में ही कहा- इसमें क्या विशेष? यह तो मैं भी जानता हूँ
कि दृढ़ रहूँगा तो भावना पूर्ण होना ही है।)
उमेश: (प्रगट में) क्या आप मुझे सीमंधर स्वामी के पास ले जा सकते हो?
बहन : नहीं, मेरी इतनी शक्ति नहीं है।
उमेश : आप तो देव हो। देवों में अपार शक्ति होती है, फिर क्यों नहीं
ले जा सकते?
बस ! इतना कहना हुआ कि देव को गुस्सा आ गया। वह जोर-जोर से हाथ पटकने
लगा। उसके हावभाव एवं क्रियाओं से भी गुस्सा जाहिर हो रहा था। गुस्से
में ही देव ने कहा- तू किसी का सिखाया हुआ आया लगता है?
उमेश : नहीं, मैं तो स्वयं ही अपनी जिज्ञासा से आया हूँ।
पर वहाँ उसकी सुने कौन? चमत्कार को नमस्कार करने आए लोग भी नाराज हो
गए और उमेश को यह कहते हुए कि 'चल जा यहाँ से, देव को कोपायमान करता
है।' भगा दिया। ऐसी परिस्थिति में उसने वहाँ से चुपचाप चले जाना ही
उचित समझा और इस प्रसंग से 'देवाऽवि तं नम्मं संति, जस्स धम्मे सया
मणो' जिसका मन धर्म में लगा रहता है, उसको देवता भी नमस्कार करते
हैं, यह भावना दृढ़ बनी। अर्थात् अन्य देवों को क्या नमस्कार करें?
धर्म-श्रद्धा दृढ़ रही तो देव भी चरणों में झुक सकते हैं, ऐसा सोचकर
धर्म-आराधना में वृद्धि करने हेतु प्रवृत्त हो गया। इस घटना से यह
सिद्ध है कि उसे देव की शक्ति का पता था। देव में इतनी शक्ति होती है
कि वह सीमंधर स्वामी के पास ले जा सकता है। यदि ऐसा नहीं तो फिर क्या
समझना? देव-गुरु-धर्म की परीक्षा करने वाले विरले ही होते हैं।
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