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बड़े भ्राता श्री रमेशचंदजी
अध्ययनशील थे; चिंतनशील थे, साथ ही उनकी प्रवृत्ति परोपकारी थी।
उन्होंने किताबों में पढ़कर कहीं से एकांतर बुखार उतारने का यंत्र
बनाना सीखा था और कइयों पर उसका प्रयोग भी किया था। अत: वह यंत्र
उन्हें सिद्ध हो गया था। अत: उनकी प्रसिद्धि थी। कई लोग आते थे। वे
यंत्र लिखकर देते और रोगी श्रद्धा के साथ उसे गले में या हाथ पर
बँधवाता था, तो उसका बुखार उतर जाता था। उमेश को यह बात ज्ञात थी, पर
यंत्र बनाना नहीं आता था।
एक बार कोई रोगी आया। बुखार से तप रहा है, घबराहट हो रही है। घर में
देखा, तो पता चला- भाई सा. कहीं बाहर गए हुए हैं। उमेश ने सोचा- क्या
किया जाए? कितनी श्रद्धा से आया है और छटपटा भी रहा है। सोचते-सोचते
एक युक्ति सूझी। यंत्र तो पता नहीं था, फिर भी एक कागज लिया, कुछ खाने
बनाए और कल्पना से ही कुछ झूठ-मूठ अंक लिखकर यंत्र बनाया और उस रोगी
को देते हुए कहा- 'भाई सा. न जाने कब आएँगे? मुझे भी यंत्र बनाना आता
है। लो यह यंत्र ले जाओ! बाँध लेना, ठीक हो जाओगे।' वह व्यक्ति बहुत
ही श्रद्धा से यंत्र ले गया और संयोग से उसका बुखार भी ठीक हो गया।
उमेश को यश प्राप्त हो गया। क्या पता पूर्व भव की साधना का प्रभाव
होगा कि मजाक में बनाए यंत्र से भी बुखार उतर गया। लेकिन उसने अनुभव
किया कि 'किसी भी कार्य की सफलता में वस्तु की अपेक्षा श्रद्धा बहुत
महत्व रखती है।' और इस प्रसंग से उसकी सम्यक् श्रद्धा में भी वृद्धि
हुई।
ऐसा ही एक अन्य प्रसंग पूर्व में भी बना था। लगभग 12-13 वर्ष की उम्र
होगी। घर के ही सामने एक नाई परिवार रहता था। नाई की पत्नी को एक बार
बिच्छू काट खाया। भगदड़ मच गई।
उमेश ने भी सुना, वहाँ पहुँचकर उस महिला को कुछ लोगस्स सुनाएँ।
लोगस्स के प्रभाव से जहर उतर गया, तब से यह प्रसिद्धि हो गई कि- 'उमेशचंद्र
को बिच्छू का जहर उतारना भी आता है।' किसी का उपचार भी किया तो
धर्म-श्रद्धा को दृढ़ रखते हुए ही। यह भी उमेश की धर्मश्रद्धा का
ज्वलंत उदाहरण था।
'श्रद्धया साध्यते सर्वम्। श्रद्धा पाप प्रमोचिनी'
- श्रद्धा से सबकुछ साध्य होता है। श्रद्धा पाप का नाश करने वाली है।
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