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बाल्यावस्था में भुआ-माँ की गोद में ओच्छब ने लोरियों
के रूप में धार्मिक गीतों का तथा चौपाइयों का ही श्रवण किया था। जैन
कुल में जैसे संस्कार मिलने चाहिए, वैसे संस्कार परिजनों से मिले थे।
शिक्षारूप में व्याख्यान की बातें सुनते हुए और सायंकाल में सामायिक
के बाद घर की या अन्य बहनों द्वारा गाईं गई ढालें, भजन-गीत आदि सुनते
हुए उमेश को धर्म-संस्कार मिलते रहे।
बड़े भाई द्वारा संरक्षण और चयनित पुस्तकें पढ़ने से भी संस्कारों
में वृद्धि हुईं। वैसे ही संवत् 1999 के पेटलावद चातुर्मास के पूर्व
कविवर्य पू. गुरुदेव श्री सूर्यमुनिजी म.सा. थांदला पधारे थे। उस समय
प्रथम बार उमेश ने पूज्य गुरुदेव श्री के दर्शन किए थे। उनकी
सत्प्रेरणा
से वहाँ धार्मिक-पाठशाला की स्थापना हुई। उमेश भी पाठशाला में जाने
लगा। वहाँ धर्मनिष्ठ, सुश्रावक श्री लालचंदजी काँकरिया पढ़ाते थे।
उनसे सामायिक आदि सीखते हुए भी धर्म-संस्कार, धार्मिक-ज्ञान, यतनामय
प्रवृत्ति की उपयोगिता की बातें भी सीखने को मिली।
पाठशाला जाने का नित्यक्रम बन चुका था। लगभग एकाध माह में ही
अर्थसहित प्रतिक्रमण-सूत्र कंठस्थ कर लिया और पेटलावद में पू.
गुरुदेव श्री सूर्यमुनिजी म. का जहाँ वर्षावास (पेटलावद) था, उत्साह
और उमंग के साथ सुना कर भी आया।
बालवय में ही इन ज्ञान-संस्कारों से उसके जीवन में कब संसार के प्रति
विरक्ति का दीप प्रज्ज्वलित हो उठा, यह स्वयं वह भी नहीं जान पाया।
लेकिन यह निश्चित है कि धीर-गंभीर मुखमुद्रा पर ज्ञान का प्रकाश
प्रसारित हो रहा था। पढ़ने में अत्यंत रुचि होते हुए भी उमेश ने
व्यावहारिक शिक्षण 7वीं कक्षा तक करके छोड़ दिया, क्योंकि उस उम्र
में उसने जान लिया था कि इस पढ़ाई का साधना-मार्ग में कोई उपयोग नहीं
है। और उस समय उमेश के मन में शायद ये भी भाव रहे हों कि मेरे
शुभ-भावों के अनुरूप वातावरण स्कूल-कॉलेज में नहीं मिल सकेगा। अत: वहाँ
पढ़ने के बजाय स्वयं साहित्य पढ़-पढ़ कर ही ज्ञान वृद्धि करता रहा।
जब किसी साधु-साध्वी के व्याख्यान में उमेश जाता था, तो जो गंभीरता
प्रौढ़ पुरुषों के मुँह पर देखने को नहीं मिलती, वह गांभीर्य एकचित्त
से व्याख्यान सुनते हुए उमेश के, चेहरे पर दिखती थी। संसार के प्रति
निर्वेद भाव जाग्रत हो चुका था। हर बात चिंतन की तुला पर तौलता था।
अपने भावों के अनुरूप उसने लेखन भी प्रारंभ कर दिया था। और अब उसके
हर कार्य में जीवन के अंधकार से आत्मा की उज्ज्वलता में प्रवेश करने
का निश्चय पूर्णत: सावधान था।
सच में, किसी धर्म-प्रवर्तक की बात धरती करती है, तो वह सिर्फ उसमें
रहे हुए प्रवर्तमान संस्कार बल का ही प्रकटीकरण होता है। 'उमेश' अब
मन से वैरागी बन चुका है और उसकी हर क्रिया में वैराग्य ही प्रकट
होता है। प्रतीक्षा है उसे श्रावक के 'वह दिन्य धन होगा, जब मैं
पंच-महाव्रत रूप निर्ग्रंथ दीक्षा अंगीकार करूँगा।' इस द्वितीय मनोरथ
के पूर्ति की! अंतर्भावों के अभिव्यक्ति की! क्योंकि उसने जान लिया
है कि-
'प्राणों का प्यार भव-भ्रमण कराता है और व्रतों का प्यार- भव-कारा से
मुक्ति दिलाता है।' और वह 'आत्म-संबोधन' में निज आतम को जगाने की ही
भावना व्यक्त करता है-
जाग रे मन ! जाग रे मन! छोड़ झंझट आज
सारी।
खोल खिड़की, खोल परदे जोत है घर-घर विहारी।।
सो लिया तू खूब अब तो, छोड़ आलस मीत मेरे।
नींद से कह-बंद कर अब प्रीत के मधु-गीत तेरे।।
चेतना भर ले नयन में, छोड़ जड़ता दु:खकारी...।
जाग रे मन ! जाग रे मन! छोड़ झंझट आज सारी।।1।।
राह देखे देखे ! बैठी सफलता वह मुक्ति प्यारी।
पैर धर तो, कार्य कर तो, जाग सकती युक्ति न्यारी।।
योग में हो भोग में हो, मात्र दृग उस और धारी ।
जाग रे मन ! जाग रे मन! छोड़ झंझट आज सारी।।2।।
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