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माँ की गोद से प्रवचन-माता
की गोद तक.....
'माँ की गोद से प्रवचन-माता की गोद तक' इस शीर्षक के अंतर्गत गुरुदेव
श्री के जन्म से लेकर दीक्षा ग्रहण करने तक के संस्मरणों का संग्रह
है। गुरुदेव श्री की इस विषय में उदासीनता और आवश्यक जानकारी के
स्रोतों का अभाव होने से इन संस्मरणों में क्रमबद्धता नहीं रह पाई
है। अतः यह संग्रह यत्र-तत्र बिखरे संस्मरण-सुमनों का मानों गुलदस्ता
ही बन गया है। फिर भी सत्यता के आधार पर प्राप्त इन संस्मरणों की
खुशबू आज भी ताजगी प्रदान करने वाली है।
पूर्वभव के शुभ-संस्कार, परिवार से प्राप्त धर्म-संस्कार और
साधु-साध्वियों की संगति से प्राप्त ज्ञान-संस्कारों से आपने यह जान
लिया कि-
राग-द्वेष दो बीज है, कर्मबंध की व्याध।
ज्ञानातम वैराग्य से, पावे मुक्ति समाध॥
- और आप संसार से विरक्त
हो गए। संप्राप्त सद्भावों का व्यामोह त्यागकर आपकी दृढ़ भावना
दीक्षा-ग्रहण की हुई। पारिवारिक मोह के कारण संघर्षों की कई घाटियों
से गुजरना पड़ा और अंततः आप विजय ध्वजा फहराकर ही रहे।
इन संस्मरणों में आप पढ़ेंगे पू. गुरुदेवश्री की माँ की गोद से
प्रारंभ हुई जीवन यात्रा से लगाकर प्रवचन-माता की गोद में पहुँचने तक
के पावन-संस्मरण और देखेंगे कि गृहस्थावस्था से ही आपमें विनम्रता,
परोपकार-वृत्ति, पाप भीरुता, संसार के प्रति उदासीनता, निर्णय में
दृढ़ता, साहित्य-रुचि, सगाई-प्रसंग में अनासक्ति, दृढ़ धर्म-श्रद्धा और
समर्पण के सद्गुणों का सद्भाव कैसा था और इन्हें पढ़कर हम इस निर्णय
पर पहुँच सकते हैं कि -'श्रेष्ठ व्यक्तित्व के रोम-रोम से निःसृत
सद्गुणों की सुरभि लाखों ग्रंथों की अपेक्षा अच्छी तरह से
जीवन-निर्माण का पाठ सिखा सकती है।
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