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साहित्य पढ़ने की तो
रुचि प्रारंभ से ही थी। साथ ही भाई सा. के निजी पुस्तकालय का भी
सहयोग था। उन्हीं किताबों में से एक बार महात्मा गाँधीजी की आत्मकथा
निकलकर उमेश पढ़ रहा था। संभवत: सन् 1948 या 1949 की बात है।
पढ़ते-पढ़ते उसका ध्यान एक-दो वाक्यों पर केंद्रित हो गया। ध्यान से
पढ़ा उसने-
'सत्य- अन्वेषक अपने आपको बहुत छोटा समझे। सत्य की प्राप्ति के लिए
रज-कण से भी छोटा बनना होता है।' इस वाक्यांश से प्रभावित होकर
उमेशचंद्र ने भी जब 17-18 वर्ष की उम्र में लेखन प्रारंभ किया, तब
अपने नाम के आगे 'अर्पिताणु' लिखा, जो बाद में 'अणु' रह गया।
उमेशचंद्र जैन तो कभी अणु जैन के नाम से 'सम्यक् दर्शन' नामक धार्मिक
मासिक-पत्र में लेख आदि रचनाएँ आती रही।
स्वयं को 'अणु' उपनाम से उल्लेखित करना अपने आपमें विनम्रता का
परिचायक है। अध्ययन के साथ विद्वता में वृद्धि तो हो ही रही थी, साथ
ही विनम्रता का भी महत्व समझ लिया था उसने, तभी तो अपना परिचय 'अणु'
उपनाम से ही देने में ज्ञान की सार्थकता है- यह सिद्ध कर दिया और तभी
से 'अणु' उपनाम से प्रसिद्ध हो गया। कहा भी है-
रज-विरज ऊँची गई, नरमाई के ताण।
पत्थर ठोकर खात है, कड़काई के काण।।
अर्थात् नम्रता की वजह से
ही जर कण ऊपर उठ जाते हैं और कठोरता या भारीपन के कारण पत्थर ठोकरे
खाता है। इसी प्रकार जो स्वयं को नम्र/विनयी/लघुता से पूर्ण बना लेता
है, वह ऊपर उठ जाता है अर्थात् उसका उत्थान होता है और अहं के भार से
भारी बने हुए ठोकरे खाते हैं।
उमेश के 'अणु' नाम की सार्थकता भी नम्रता में ही है।
आवश्यक निर्युक्ति में श्री हरिभद्र सूरिश्वर ने भी कहा है-
'विणओ जिणसासणे मूलं, विणीओ संजओ भव।'
- विनय जिनशासन का मूल है।
विनयवान् आत्मा ही संयमी बन सकती है।
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