|
बाह्य निमित्तों का उपादान
के प्रगटीकरण में उतना ही महत्व रहता है, जितना तिल से तेल-प्राप्ति
में यंत्रों का और जल रक्षार्थ कुंभ का। उमेश का उपादान भी बाह्य
निमित्तों से प्रकट हो रहा था। एक-एक कक्षाओं को विशेष प्रावीण्य के
साथ वह पार कर रहा था और उसी के साथ उसकी समझ बुद्धि भी विकसित हो रही
थी। उस समय यह सुविधा थी कि मेधावी विद्यार्थी 2 कक्षाएँ एक साथ (6-6
माह में) उत्तीर्ण कर सकते थे। उमेश ने भी 4-5वीं एक साथ उत्तीर्ण कर
ली। बात तब की है, जब उमेश 6ठीं कक्षा में पढ़ रहा था। स्कूल में 'कविता-लेखन'
प्रतियोगिता का आयोजन था। उमेश ने भी पहली बार प्रयास किया और 'शरद-सुषमा'
शीर्षक से कविता लिखी। प्रतियोगिता-परिणाम घोषित हुए और उमेश को
प्रथम पुरस्कार से पुरस्कृत किया गया। पहली बार कुछ लिखा था और उसका
मूल्यांकन भी स्कूल में पुरस्कार द्वारा हो चुका था, अत: प्रसन्नता
होना स्वाभाविक था।
उमेश की वह कविता 'शरद-सुषमा' बड़े भ्राता श्री रमेशचंद्रजी ने देखी।
श्री रमेशजी स्वतंत्रता सेनानी थे। उन्हें साहित्य के प्रति गहरी रुचि
थी एवं जानकारी भी थी। उन्होंने अपने ही घर में एक निजी पुस्तकालय
भी बना रखा था। उन्होंने उमेश की कविता पढ़ी। उमेश उनके चेहरे के
हाव-भाव देख रहा था। अनुमान लगाया कि वे कविता से प्रसन्न नहीं हैं।
उमेश ने पूछ लिया- 'भाई सा.! कैसी है कविता?' उन्होंने नापसंद सूचक
गर्दन हिलाई और कहा- 'इसमें तो मात्राओं की गड़बड़ी है। कविता बनाते
समय मात्रा-छंद आदि का ध्यान रखने से उसके सौंदर्य सौष्ठव में वृद्धि
होती है।'
फिर उन्होंने अपने पुस्तकालय से पद्य-प्रदीप और छंद-प्रभाकर नामक दो
किताबें उमेश को पढ़ने के लिए दी और कहा- 'इनके अध्ययन से तुम्हारी
कविताओं में निखार आएगा।' उमेश ने भी हतोत्साहित न होते हुए अपूर्व
उल्लास के साथ किताबें ग्रहण की और उन्हें आत्मसात करने में जुट गया।
इस प्रकार उमेश के किशोर-मन में अनायास ही साहित्य-रुचि बीज का वपन
हो गया।
अब तो जब देखो तब उमेश पुस्तकालय में नित नई किताबों में निमग्न नजर
आता। कई बार तो उसे अपनी सुध-बुध नहीं रहती। एक दिन दो-चार घंटे हो
गए। उमेश कहीं नजर नहीं आ रहा है। गर्मी का मौसम है। घर में समस्त
परिवार के लिए ठंडाई घुँट रही थी। जब सबने ठंडाई पी, तो अनायास ही
उमेश की अनुपस्थिति माँ को अखरी। 'कहाँ गया उमेश? किसे कहकर गया?'
पूछताछ होने लगी तभी बड़े भाई सा. ने आकर कहा- 'उमेश और कहीं नहीं,
ऊपर पुस्तकालय में होगा!' देखा माँ ने ऊपर जाकर। गर्मी के कारण छत तप
रही है। उमेश पसीने में तरबतर हो रहा है, फिर भी दुनिया से बेखबर
तल्लीनता से किसी पुस्तक में खोया है। माता की आवाज से तंद्राभग्न
हुई और उमेश चुपचाप माँ के आगे-आगे नीचे उतरने लगा।
इस प्रकार साहित्य के प्रति उमेश को बचपन से ही लगाव हो गया और
समय-समय पर उसमें वृद्धि होती रही। जब भी कोई साधु-साध्वी स्वर्ण के
तारों में मोती जड़े सुदंर हस्ताक्षर देखते, तो अपना लेखन-कार्य उमेश
से करवाते और उस समय उमेश भी इस शर्त पर लिखने को तैयार होता कि पहले
चौपाई पढ़ने को दो या कोई कहानी सुनाओं तो लिखूँ। और लिखने के बहाने
भी ज्ञान-वृद्धि होती रही। पंचेड़वाले पू. श्री गुलाबकुँवरजी म.सा.
श्रद्धेया-गुरुवर्या पू. श्री चाँदकुँवरजी म. के तो कई व्याख्यान के
पन्ने लिखे। कई बार उमेश श्री दाखाजी म., संपतकँवरजी म. आदि साध्वीजी
से मजाक में कह देता- 'कहानी सुनाओ- नी तो मैं अड़ी जाऊँगा।' (नहीं
तो मैं छू जाऊँगा।) अब धार्मिक साहित्य का वाचन-श्रवण भी उसे प्रिय
लगने लगा।
थांदला के ही वरिष्ठ श्रावक श्री लालचंदजी काँकरिया धर्म में अच्छी
रुचि रखते थे। गहरी समझ थी उनकी। वे स्वाध्यायी के रूप में अकेले ही
स्वाध्याय हेतु भी जाते थे। उनके पास महाबल चरित्र, चंदन-मलया आदि कई
चरित्र थे। उमेश की धर्म-कथाओं में रुचि देखकर वे चारित्र उन्होंने
पढ़ने के लिए दिए।
इस प्रकार जानने की, पढ़ने की ललक थी और हर तरह से उसने साहित्य रुचि
के बीज पल्लवित करने का ही प्रयास किया।
आगे पढें... |