|
बाल्यावस्था कोमल टहनी के समान होती
है। उसे जिस दिशा में मोड़ना चाहो, मोड़ा जा सकता है। ऐसा ही हुआ
ओच्छब के साथ। सात वर्ष की उम्र में पिताजी की ऊँगली पकड़कर वह
स्कूल गया। सरस्वती-पुत्र का ज्ञान-मंदिर में पहला चरण था। पिताजी ने
गुरुजी से परिचय करवाया और जानकारी लेकर आवश्यक निर्देशों की पूर्ति
करके ओच्छब का नाम लिखवा दिया। थांदला में उस समय 'धर्मदास विद्यालय'
चलता था। उसी स्कूल में प्रवेश था। बड़े भ्राता श्री रमेशचंदजी के
मित्र स्वतंत्रता-संग्राम सेनानी मामा बालेश्वर दयाल दीक्षित ने सभी
विद्यार्थियों के नाम परिवर्तित किए। अत: ओच्छब का नाम भी उन्होंने 'उमेशचंद्र'
कर दिया।
वैसे उमेश का एक अर्थ होता है- उमापति अर्थात् 'शंकर' तो दूसरा अर्थ
होता है- 'शक्तियों का स्वामी!' क्या पता उन्होंने बाल्यावस्था में
ही बालक में रही हुई अनंत शक्ति का अनुमान लगा लिया था? अस्तु, जो भी
हो... उमेशचंद्र घोड़ावत इस नाम से ही पहली कक्षा में प्रवेश कर गया।
दूसरे दिन से उमेश समय पर स्कूल गया और विधिवत् पढ़ने में तत्पर हो
गया। जिस दिन उसने कोरी पट्टी पर अ-आ लिखा होगा और घोंटा होगा, सच
में वह दिवस उसके जीवन का धन्य-दिवस बन गया। नियमित अध्ययन, गृहकार्य
करने में उसे रुचि थी। स्मरण-शक्ति भी
गजब की थी। कुछ दिन तो यथावत् चलता रहा । लेकिन कभी-कभी बालमन भी
विचलित हो जाता है। कुछ बाह्य निमित्त मिलने से उमेश का मन भी पढ़ाई
से पहली कक्षा में ही उचट गया।
हुआ यों कि उन्हीं दिनों किसी ज्योतिषी ने बालक उमेश का हाथ देखा और
हाथ देखकर कह दिया कि 'तुम विद्या प्राप्त नहीं कर सकते। तुम्हारे
भाग्य में विद्या चढ़ना कठिन है।' बालमन तो था ही, ज्योतिषी की बात
का असर कर गई। सोच लिया मन ही मन 'अब पढ़ने से क्या फायदा? क्यों करूँ
मैं व्यर्थ की मेहनत? मेरे भाग्य में तो विद्या है ही नहीं।' स्कूल
में तो परिजनों के भय से जाता रहा, लेकिन मन लगाकर पढ़ना छोड़ दिया।
उस समय कक्षा में 'भारत-गान' नामक पुस्तक पढ़ाई जाती थी। उसे याद करना
आवश्यक होता था। लेकिन उमेश ने उसे याद करने का प्रयास ही नहीं किया,
क्योंकि ज्योतिषी की बात मन में घर कर गई थी। जब स्कूल के अध्यापक
श्री हीरालालजी शास्त्री ने उमेश को पाठ सुनाने के लिए खड़ा किया, तो
उसने सहजता और सरलता से कह दिया- 'मैंने पाठ याद किया ही नहीं।' जब
शास्त्रीजी ने कारण पूछा, तो ज्योतिषी की बात जैसी की तैसी सुना दी।
यह बात सुनकर शास्त्रीजी ने कहा - 'बेटा ! भाग्य तो पुरुषार्थ से ही
बनता है। मेहनत करोगे तो भाग्य अवश्य चमकेगा। समझे?' उमेश- 'जी! पर
कैसे याद करूँ? मन ही नहीं होता।' तब उन्होंने उमेश को पाठ करने की
विधि समझाई- 'सुबह जल्दी उठकर 2-3 पंक्तियाँ पढ़ना। फिर किताब बंद
करके बोलकर देखना। यदि न आए तो पुन: किताब देखकर पढ़ना, पुन: किताब
बंद करके बोलना- इस प्रकार करोगे, तो कुछ ही देर में पाठ याद हो जाएगा।'
विनय तो था ही शास्त्रीजी की बात को शिरोधार्य करते हुए उमेश ने पाठ
याद करने का संकल्प किया।
घर जाकर शास्त्रीजी के निर्देशानुसार पाठ याद करने का प्रयास किया और
पाठ याद हो गया। प्रतिदिन अनमने मन से स्कूल जाने वाला उमेश आज
बार-बार घड़ी देख रहा है कि कब स्कूल का समय हो और मैं जाकर पाठ
सुनाऊँ। इस बीच उसने कई बार पाठ दोहराकर देख लिया। स्कूल का समय हुआ,
कक्षाएँ प्रारंभ हुई और अध्यापकजी के आते ही बालक उमेश ने उत्साह के
साथ कहा- 'गुरुजी! पाठ याद हो गया।' शास्त्रीजी ने कहा- 'सुनाओ वत्स!'
आज्ञा पाकर उमेश ने जब पाठ सुनाया तो अध्यापकजी हर्षविभोर हो गए।
उन्होंने कहा- 'बहुत सुंदर ! अन्य बच्चे तो ठीक से शब्दों का उच्चारण
भी नहीं कर पा रहे हैं, परंतु उमेशचंद्र ने तो विराम चिह्नों सहित
शुद्ध पाठ सुनाया है। यह बालक आगे जाकर बहुत बड़ा विज्ञान बनेगा।'
शास्त्रीजी के इन आशीर्वचनों से और इस प्रसंग से तो उमेश के
दिलों-दिमाग में दृढ़ विश्वास हो गया कि मेरे भाग्य में तो विद्या है
और उसी दिन से दुगुने उत्साह के साथ विद्या-प्राप्ति हेतु वह प्रयास
करने लगा। और पहली कक्षा में ही उसने कालिदासजी का 'बाल रघुवंश' पढ़
लिया।
आगे पढें... |