सुंदर अक्षरों का राज

उस समय स्कूल में 7 वर्ष की उम्र के पहले प्रवेश नहीं होता था। अत: बालकों को प्रारंभिक अध्ययन करने हेतु व्यक्तिगत क्लास चलाते थे। बच्चे घर में ही खेले-कूदे तो माता को कार्य में परेशानी हो। अत: बच्चों को उन क्लासों में पढ़ने के लिए भेजते थे। उमेश को भी पढ़ने के लिए भेजा गया।

पं. श्री पूर्णाशंकरजी, पं. श्री साँखलाजी एवं संभवत: पं. रामचंद्रजी (या रामलालजी) इन तीनों अध्यापकों ने प्रारंभिक हिंदी का अध्ययन करवाया। बात उस समय की है जब पं. पूर्णाशंकरजी के पास उमेश पढ़ने के लिए जाने लगा। उन्होंने हिंदी अक्षरों की लिखावट सिखाई। स्वयं हाथ पकड़कर जमा-जमाकर अक्षर लिखना- वे सिखाते थे।

एक दिन की बात है। ठंड का मौसम था। माता नानीबाई ने काम में ठंड न लगे- इस उद्देश्य से सिर पर कपड़ा बाँध दिया और तैयार करके पढ़ने भेजा। प्रतिदिन की भाँति पं. श्री पूर्णाशंकरजी पढ़ाने लगे। लिखते-लिखते बालक उमेश से कुछ भूल हो गई, तो पंडितजी ने कान पर चिकोटी काट दी। (जोर से चिमटा भर दिया) कान से खून निकला, पर उमेश तो न रोया, न चिल्लाया। उसका तो ध्यान मन लगाकर भूल सुधारने में ही लगा रहा।

ज्योंही छुट्‍टी हुई- घर आया। माताजी के कान पर बंधा वस्त्र खोलने के लिए हाथ बढ़ाएँ, तो देखती क्या है- खून की वजह से कपड़ा कान से चिपक गया है, खिंचकर निकालने में भी कठिनाई हुई। उमेश से पूछा गया- 'यह क्या?' उसे यह तो पता था नहीं कि खून आया है। लेकिन 'पंडितजी ने मेरी भूल पर चिकोट‍ी काटी थी'- यह जरूर बताया। पुत्र पर अत्याधिक मोह की वजह से अध्यापक बदल दिया। फिर भी उमेश ने अपने मोतियों जैसे सुंदर अक्षरों के लेखन का श्रेय पंडित श्री पूर्णाशंकरजी को ही दिया, जिन्होंने घोंट-घोंटकर जमावट के साथ सुंदर अक्षर लिखना सिखाया था।

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