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कहते हैं, बालक की प्रथम गुरु या
प्रथम शिक्षिका 'जननी' होती है। माँ अपने रक्त में वात्सल्य-रस घोलकर
उसे दुग्ध-सा धवल बनाकर बालक को पिलाती है। और साथ ही जन्म घूटी में
ही संस्कारों की घूँटी पिलाना भी नहीं भूलती है।
माता-पिता की स्नेहभरी छाया में, धर्ममय भावों में, एकाग्रता और
विनम्रता के साथ ओच्छब बड़ा हो रहा है। संस्कार तो मिल ही रहे हैं।
प्रतिदिन माँ के सामने तुतलाने शब्दों में वह नवकार-मंत्र का उच्चारण
करता है। माँ की ऊँगली पकड़कर स्थानक में जाता है और रोज बिना भूले
ही दादाजी-दादीजी, माताजी-पिताजी तथा बड़ों के चरण-स्पर्श 'जय-जिनेंद्र'
कहते हुए करता है।
जिसने विनम्रता का सोपान चढ़ लिया, उसके जीवन की सार्थकता का मानो
प्रारंभ हो गया। बाल्यावस्था से ही व्यक्ति की गति प्रारंभ हो जाती
है। उसकी दिशाएँ भले ही निश्चित न हो, पर जो चरित्र धर्म-संस्कार का
पाथेय लेकर जन्मता है, दिशाएँ भी उसका इंतजार करती हैं।
नहलाने के बाद आँखों में अंजन आँजने के साथ ही माता नानीबाई
धर्म-संस्कारों को भी आँजती है। जीवन-व्यवहार के निर्देशनों के साथ
ही धर्ममय जीवन जीने के छोटे-छोटे उद्देश्य सिखाती है। और परिणाम यह
होता है कि जिस बाल्यावस्था को बालक मिट्टी के घरौंदे एवं टीले बनाने
में तथा काँच के टुकड़े एकत्रित करने में व्यतीत कर देते हैं, वही
बाल्यावस्था 'ओच्छब' के लिए महत्वपूर्ण बन गई। आम बच्चों के साथ में
खेलना उसे पसंद नहीं। घर में बुजुर्ग माताजी या भुआ-माँ सामायिक करके
बैठते तो ओच्छब भी उनके पास आकर बैठ जाता। मुँहपत्ति के लिए जिद करता,
तो कभी हाथ में माला लेकर 'नमो-नमो' करता रहता।
एक चींटी भी दिख जाए तो उसे बचाने का प्रयास रहता। क्योंकि 'अपने जैसी
ही आत्मा की चींटी में है' यह सीख उसे बचपन से मिली थी और कुछ
पूर्वभव के संस्कार थे। अब उन संस्कारों में प्रति पल वृद्धि हो रही
है। व्यावहारिक शिक्षण हेतु मानस तैयार किया जा रहा है, ताकि पढ़-लिख
कर अपनी मंजिल तय कर लें। और इसी उद्देश्य से माता-पिता प्रयासरत थे।
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