जन्मोत्सव उत्सवलाल का

तस्वीरों-सा खिसकता समय कुछ पलों के लिए स्थिर हो गया। मानो वह भी उस पुण्यात्मा के जन्म की खुशियाँ मनाने के लिए जैसे लालायित हो। कहते हैं, जो जीव संस्कार-बल का सामर्थ्य लेकर जन्म धारण करता है, तो दिशाएँ भी उसका सम्मान करती हैं। इस धरती की दशो-दिशाएँ प्रसन्न थी, पुलकित थी। अमावस की गहन रात्रि में 'जन्म' नहीं अव‍तार था उस महातेजस्वी आत्मा का और वह दिवस था- ज्योतिष-विज्ञ, पंडित श्री महेंद्रजी भट्‍ट के घर रखे टिप्पण के अनुसार- 'सेठ रिखबचंदजी रा घर कुँवर का जन्म। फागण वदी 30 की रात में सोमवार संवत् 1988 (ई.स. 7 मार्च, 1932 )'।

अमावस की गहन रात्रि पूर्ण यौवन पर थी। श्री रिखबचंदजी की जेष्ठ कन्या श्रीमती शानीबाई को किसी ने पीछे के कोठे से पुराने वस्त्र लाने भेजा, तो उन्होंने अनुभव किया- पीछे खुले भाग में केशर की सुगंध आ रही है। उन्होंने आकर सभी को बताया। सभी ने प्रत्यक्ष अनुभव किया कि सारे घर का ही वातावरण केसर से सुगंधित बना है। प्रात: सूर्य की अरुणाभ आभा में किसी की दृष्टि ठहरी, चौक में अमरुद के पेड़ के पत्तों पर। वहाँ का पत्ता-पत्ता केसर के छींटों से शोभित था। रात्रि में अनुभूत घ्राणेंद्रिय के विषय को चक्षुरिन्द्रिय ने भी पुष्‍ट किया, और...

सभी को विश्वास हो गया कि यह उसी श्रेष्‍ठ जीव के आगमन का प्रभाव है, जिसने अमावस की निशा में मिथ्यातम को हटाकर दूज के चाँद की तरह वृद्धिंगत होते हुए पूर्ण ज्ञान की पूनम को पाने के लिए जन्म लिया था। उसी दिन थांदला नगरी में प्रवर्तनी पू. श्री टिबूजी म.सा. के सानिध्य में साध्वी श्री संपतकुँवरजी म.सा. (कालूजी म.सा.) की दीक्षा का आयोजन था। उत्सव का माहौल था। दीक्षा का महोत्सव था। अत: नवागंतुक शिशु का नाम भी 'उत्सवलाल' (ओच्छब) रखा गया।

उत्सवलाल के जन्म से परिवार में प्रसन्नता थी। जन्म के समय केसर-वर्षा हुई। केसरिया रंग त्याग का प्रतीक होता है। उन्हें क्या पता किसी त्यागी आत्मा ने जन्म लिया है। वे तो बस, पुण्यवान आत्मा का आगमन मानकर ही प्रसन्न थे। माता तो विशेष खुश रहती थी, क्योंकि गर्भ-धारण काल से ही माता की खुशियों में वृद्धि हुई थी। धर्म-भावनाएँ प्रबल बनी थीं। अत: वह इसी चिंतन में थी ओच्छब को किस प्रकार से संस्कार देने चाहिए और भावी रूपरेखा बनाने में वह निमग्न रहती थी। प्रतिदिन बालक को दोनों वक्त नवकार-मंत्र, माँगलिक सुनाना नहीं भूलती थी।

बालक बहुत ही सलौना था। तीन बहनों के बाद जन्म होने से उसे 'ति‍तरिया' भी कहा जाता था। सभी को प्यारा लगता था वह। बहनें गोद में लेने के लिए मचलती थी- 'भैया राजा !' कहकर दुलार करती थी। भुआ-माँ उसे हालरिएँ सुनाती थी। जन्मोत्सव की खुशियाँ कई दिनों तक मनाई गईं। बधाइयाँ बाँटी गईं। शहनाइयों की धुन में बालक मस्ती से झूम उठता था, मानो मानव-जन्म की सार्थकता समझकर वह इस दुनिया में आया हो और प्रतीक्षा कर रहा हो, उस सुनहरे पल की जो उसे मुक्ति की मंजिल की ओर बढ़ाने वाला हो।

आगे पढें...