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आज माता नानीबाई के मुख-मंडल पर अलग
ही आभा झलक रही थी। ह्रदय में प्रसन्नता का अनुभव हो रहा था। आँखों
में अजीब-सा तेज प्रतीत हो रहा था। आकाश स्वच्छ था, तारामंडल चमक रहा
था। इन ताराओं और ग्रहों के साथ शोभायमान आकाश में माँ नानीबाई एकटक
देख रही थी। एक भीनी-भीनी पवन की लहर आई और नानीबाई को शीतलता का
स्पर्श कराकर चली गई। निद्राधीन होने से पहले उन्होंने प्रभु-स्मरण (नवकार-मंत्र,
4 लोगस्स का ध्यान) किया। मन में प्रसन्नता थी, धीरे-धीरे पलकें
मूँदने लगी...
बाह्य जगत् से निश्चिंत होकर वे सोई थीं, लेकिन अंतर्दृष्टि से
स्वप्न जगत् में चेतना का अनुभव कर रही थीं। स्वप्नभूमि में मग्न एक
हरा-भरा पर्वत देखा। देखा- पर्वतमालाओं से निकलकर धीमी गति से चलकर
अपने समीप आते हुए एक सिंह को। उसे देखकर मन में प्रसन्नता का अनुभव
हो रहा था। शौर्य की पगलियों से अपनी ही मस्ती में चलते हुए उस सिंह
ने नानीबाई के मुख-मंडल में प्रवेश किया। यह स्वप्न है या सत्य? बहुत
देर कि माता इस अलौकिक अनुभव को न भूल सकी।
धार्मिक संस्कारों से परिपूर्ण नानीबाई को संत-समागम, प्रवचन-श्रमण
से यह ज्ञात था कि तीर्थंकर की माता 14 शुभ स्वप्न देखती हैं, उन्हीं
14 स्वप्नों में से मैंने सिंह का एक शुभ-स्वप्न देखा है। रात्रि के
अंतिम प्रहर में देखा हुआ स्वप्न फलदाई माना जाता है और शुभ स्वप्न
देखने के बाद पुन: शयन से स्वप्न-फल नष्ट हो जाता है, अत: शेष रात्रि
धर्माराधना में ही बितानी चाहिए। अपनी शय्या से उठकर बैठी, मन में
अनूठी प्रसन्नता थी। एक सामायिक के प्रत्याख्यान लिए और धर्म-चिंतन
के साथ समय व्यतीत किया। ज्योंही सूर्योदय हुआ सेठ श्री रिखबचंदजी को
स्वप्न के विषय में बताया। उन्होंने स्वप्न फल विज्ञान का अध्ययन कर
रखा था। सुनकर वे भी प्रसन्न हुए, कहने लगे- 'एक पवित्र आत्मा ने
जन्म धारण करने के लिए तुम्हारे गर्भ में प्रवेश किया है, ऐसा स्वप्न
संकेत है। अब तुम्हें सुचारू रूप से उसकी परिपालना करनी है। निश्चय
ही वह एक ऐसी महान आत्मा होगी, जो हमारे कुल के गौरव में चार चाँद
लगाकर वृद्धि करेगी।'
सुनकर हर्षित हुई माता परमोल्लास का अनुभव करती हुई पतिदेव के चरणों
में नत होकर कहने लगी, 'तब तो मेरा मातृत्व धन्य हो जाएगा। धन्य हो
जाएगी मेरी कोख !' कहते-कहते उनकी आँखों से हर्षाश्रु छलक पड़े। सेठ
रिखबचंदजी ने दोनों हाथों से उठाकर उनकी खुशियों का हार्दिक स्वागत
किया।
योग भी ऐसा ही बना। शुभ-स्वप्न के साथ गर्भ-धारण के पूर्व ही माता
नानीबाई की 'धर्मचक्र' नामक तपस्या उपवास के साथ पूर्ण हुई थी।
धर्मचक्र में उपवास-बेला-तेला-पचौला-चोला-तोला-बेला-उपवास = इस
प्रकार 25 उपवास एवं शेष पारणे आते हैं। इसी प्रकार तपरूपी धर्मचक्र
का पूर्ण होना और एक दिव्यात्मा का माता के गर्भ में आना- मानो दूसरे
धर्मचक्र के प्रारंभ का सूचन ही था।
माता गर्भ की परिपालना सतर्कता से करती रही। वैसे तो यह पाँचवीं
संतान जन्म लेने वाली थी, फिर भी इस समय एक अलग-सी अनुभूति, आनंद और
आत्मविश्वास का आभास माता को हो रहा था। गर्भधारण काल से ही
स्वाध्याय, सुपात्र-दान, संयमित खान-पान का ध्यान वह रखने लगी। कहते
हैं, माता के व्यवहार तथा विचारों का प्रभाव गर्भस्थ जीव पर होता है,
तो कभी-कभी गर्भस्थ जीव का प्रभाव माता की भावनाओं पर होता है। इसका
प्रसिद्ध उदाहरण हमारे समक्ष है, कि चेलना रानी जैन धर्म की उपासिका
थी। राजा श्रेणिक की वह सच्चे अर्थ में 'धर्म-पत्नी' थी। उन्हें जैन
धर्म के प्रति उसने श्रद्धावान बनाया था। लेकिन जब से उसके गर्भ में
कुणिक का जीव आया, तो उसे दोहद उत्पन्न हुआ कि 'मैं पिता श्रेणिक के
कलेजे का माँस खाऊँ।'
रानी चेलना जैसी सुश्राविका जब माँस (वह भी अपने पति का) खाने की
इच्छा करें, तो क्या यह उसकी इच्छा थी? नहीं, यह तो गर्भस्थ जीव की
भावना का ही प्रभाव था। कहने का तात्पर्य सिर्फ इतना कि गर्भस्थ जीव
की भावनाओं का प्रभाव माता की भावनाओं पर होता है। और जब दोनों की
भव्य भावनाओं का मिश्रण हो जाए, तो सोने में सुहागा हो जाता है। माँ
की धार्मिक-भावनाएँ भी उत्कृष्टता को छूने लगीं। गर्भस्थ जीव भी
प्रशस्त स्थान से च्यवकर आया था- आत्म कल्याण की कामना के साथ-साथ
विश्व कल्याण का सुनहरा भविष्य संजोकर!
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