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भाग्य-भानु चमकने में समय के साथ ही
स्थान का महत्त्व होता है, प्राय: ऐसी मान्यता संसारियों की रही है
और ऐसे कई प्रयोग उन्होंने किए हैं। होनहार कहो या पुण्योदय-सफलता भी
उन्हें प्राप्त हुई है। ऐसी ही सोच के साथ घोड़ावत-छजलानी' कुल के
पूर्वजों की परंपरा से नागौर (राजस्थान) निवासी दो सगे भाई श्री
कोदाजी तथा श्री भागचंदजी ने भी व्यापार-वृद्धि हेतु अन्यत्र जाने का
विचार किया। अपने विचारों को क्रियान्वित करने के लिए अपनी जन्मभूमि
को नमन करके निकले और कुशलगढ़ (राज.) पहुँचे।
वहाँ उन्होंने अपने व्यवसाय को नया मोड़ देने का प्रयत्न किया। लेकिन
धन कमाने में जब तक भाग्य का सितारा बुलंद न हो तब तक हर प्रयास
निष्फल हो जाता है। प्रसंग भी ऐसा ही बना- प्रारंभ के कुछ बरसों में
तो उन्होंने अच्छी संपत्ति का उपार्जन किया था। व्यापार भी प्रगति पर
था। खुद का मकान भी बन चुका था। तभी अशुभ कर्मों का उदय हुआ, एक दिन
आग की लपटों में मकान जल गया- लाखों का नुकसान हुआ। उन्नति की
अभिलाषाएँ मानों जलकर ढ़ेर हो गई। लेकिन दोनों भ्राता घबराएँ नहीं। 'हिम्मत
है मर्दा तो मदद दे खुदा' की कहावत पर भरोसा रखकर पुन: जुड़ गए- नई
उमंग के साथ पुरुषार्थ करने के लिए। पुरुषार्थ ही तो जीवन धर्म है।
सुख और प्रगति का पवन जिस दिशा में तीव्र गति से बहता है, उस दिशा
में गमन करना- यह वणिक का स्वभाव है। दोनों भ्राताओं में से श्री
कोदाजी ने भी स्थानांतर का विचार किया और कुशलगढ़ से 30 कि.मी. की
दूरी पर मध्यप्रदेश के डुंगर प्रांत के झाबुआ जिले में 'थांदला-ग्राम'
की धरती पर स्थित हो गए। वणिक-पुत्र कहीं भी भूखा नहीं रहता। अपने
चातुर्य और पुरुषार्थ से कमाने की कला वह जानता है। श्री कोदाजी ने
भी थांदला में अपनी अच्छी साख जमा ली।
श्री कोदाजी के चार सुपुत्र थे- (1) श्री दौलतरामजी (दौलाजी के नाम
से पहचाने जाते थे।) श्रीमान दोलाजी अपने समय के एक सुप्रतिष्ठित एवं
सुसंपन्न श्रावक थे। उन्होंने न केवल व्यापार-व्यवसाय में बल्कि
धर्म-प्रभावना के कार्यों में भी अच्छी ख्याति प्राप्त कर ली थी।
डुंगर प्रांत के अग्रगण्य श्रावकों में तथा व्यापारियों में आपकी गणना
होती थी। (2) श्री टेकचंदजी (3) श्री फतेहचंदजी (4) श्री रूपचंदजी एवं
दो सुपुत्रियाँ थीं। उनमें से एक सुपुत्री ने, आचार्य पू. श्री
जवाहरलालजी म.सा. के संप्रदायानुवर्तिनी श्रमणी-समुदाय में दीक्षा
ग्रहण कर लगभग 15 माह का संयम पालन करके जीवन को सफल बना लिया।
द्वितीय सुपुत्री श्रीमती नवलबाई का विवाह थांदला के ही शाहजी परिवार
में हुआ था।
श्री कोदाजी के बड़े सुपुत्र श्री दौलतरामजी के एक पुत्र-रत्न एवं दो
पुत्रियाँ थीं। उनके नाम क्रमश: श्री रिखबचंदजी, श्रीमती गंगाबाई,
श्रीमती चाँदबाई। धर्मनिष्ठ सुश्रावक श्री रिखबचंदजी बहुत ही शांत
स्वभाव एवं धार्मिक प्रवृत्ति वाले थे। वे कुशल व्यापारी तो थे ही
साथ ही धार्मिक तथा सामाजिक कार्यों में भी अग्रगण्य थे। उनका विवाह
लिमड़ी (पंचमहल, गुजरात) के श्रीमान जड़ावचंदजी सा. झामर की सुपुत्री
नानीबाई के साथ हुआ। धार्मिक विचारों एवं सु-संस्कारों से परिपूर्ण
सुश्राविका श्रीमती नानीबाई ने नवरत्नों के समान नौ संतानों को जन्म
दिया और उन्हीं में हमारी अनंत/असीम/अटूट आस्था के केंद्रबिंदु
श्रद्धेय प्रवर्तक पू. गुरुदेव श्री उमेशमुनिजी म. का क्रम संयोग से
पाँचवा रहा।
जिस प्रकार मोतियों की माला के मध्यभाग में पदक होता है और वह पदक
ह्रदय पर स्थान प्राप्त करता है, उसी प्रकार आपश्री का भी भाई-बहनों
के मध्य में स्थान है। आपने माता-पिता, परिजनों के ह्रदय में तो
स्थान पाया ही था, लेकिन आज जन-मानस के/भक्तों के ह्रदय पर स्थान पा
लिया है।
धर्मस्नेही सुश्रावक श्रीमान रखबचंदजी तथा सौभाग्यशालिनी माता
नानीबाई की नौ संतानों के क्रमश: नाम-
1. स्व. रमेशचंदजी : आप स्वतंत्र सेनानी थे। आपकी पूज्य श्री के
उत्थान में काफी महत्वपूर्ण भूमिका रही। वर्तमान में आपके सुपुत्र
श्री सुरेशचंदजी, श्री विमलचंदजी तथा सुभाषजी थांदला, देवास, इंदौर
में रहते हैं।
2. स्व. श्रीमती शानीबाई भंडारी (संजेली)
3. श्रीमती सोहनबाई रूपचंदजी लोढ़ा (थांदला)
4. श्रीमती मोहनबाई सोलंकी (पेटलावद)
5. श्री ओच्छबलालजी (श्री उमेशचंद्रजी)
6. श्रीमती रोशनबाई बुरड़ (कतवारा)
7. स्व. श्रीमती कमलाबाई शाहजी (थांदला)
8. स्व. श्री चंद्रकांतजी (वर्तमान में सुपुत्र महावीरजी,
जितेंद्रकुमार)
9. श्री कनकमलजी (सुपुत्र-विशाल)
यह अति संक्षिप्त परिचय प्राप्त है, उस घोड़ावत-कुल का, जिस कुल में
हमारे चरित-नायकजी का जन्म हुआ। इस कुल का नाम रोशन है दिग्-दिगन्त
में आप जैसे कुलदीपक के ही आलोक में। तो आइए, हम देखें शब्दों के आइने
में उभरती श्रद्धेय, प्रवर्तक गुरुदेव श्री उमेशमुनिजी म.सा. के जीवन
की झाँकियाँ...
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