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धरती तो आश्रय मात्र
है। जगत पुराने से नया बनता जा रहा है और परिवर्तन होते रहते हैं।
ऋषिप्रधान भारत देश के ह्रदय-स्थान में विराजमान 'मध्यप्रदेश' का
अपना विशिष्ट अस्तित्व रहा हुआ है। क्षेत्रीय विस्तार के साथ ही
राजनैतिक, सामाजिक, व्यापारिक और धार्मिक दृष्टिकोण से भी इसका महत्व
रहा हुआ है। महाकवि कालिदास का भी कथन है- 'देश मालव गहन गंभीर,
डग-डग रोटी पग-पग नीर' । इस कहावत से ही हम इस प्रदेश की समृद्धि का
अंदाजा लगा सकते हैं।
इस मध्यप्रदेश का एक विभाग 'डुंगर प्राँत' कहलाता है। वर्तमान में
मध्यप्रदेश का झाबुआ जिला, धार जिले की सरदारपुर तहसील, राजस्थान का
बाँसवाड़ा जिला और गुजरात राज्य का दाहोद जिला इन नगर-ग्रामों का
क्षेत्र 'डुंगर प्राँत' है। डुंगर अर्थात् छोटा पर्वत। यहाँ की भूमि
प्राय: पथरीली और पर्वतीय है। पहले यहाँ बहुत घने जंगल थे। शासकीय
दृष्टि से डुंगर प्राँत नामक किसी क्षेत्र का अस्तित्व नहीं है। यह
संज्ञा मात्र लोगों द्वारा दी गई हैं।
इस क्षेत्र में लगभग 80-85 प्रतिशत आदिवासी निवास करते हैं। उनकी
प्राय: सम्मिलित बस्तियाँ नहीं हैं। सभी के टापरे दूर-दूर तक बिखरे
हुए हैं। जब अधिकांश जनता बिखरी हुई हो, तो स्वाभाविक है यहाँ शहर
नहींवत् हैं। छोटे-छोटे कस्बों में गैर आदिवासी रहते हैं।
'झाबुआ' जिला इसी डुंगर प्रांत के अंतर्गत आता है, जो एक छोटा-सा एवं
भौतिक दृष्टि से अत्यंत पिछड़ा हुआ क्षेत्र है। झाबुआ जिले की
अधिकांश तहसीलें गुजरात से जुड़ी हुई हैं। यहाँ के आदिवासी प्राय:
मजदूरी से आजीविका चलाते हैं। वे मजदूरी हेतु कोटा, बड़ौदा, सूरत और
तक चले जाते हैं।
इस झाबुआ जिले का एक प्रमुख कस्बा है- 'थांदला'।
थांदला तहसील दो राज्यों (गुजरात एवं राजस्थान) की सीमा से लगी हुई
हैं। आजादी के पूर्व यह थांदला कस्बा दो हिस्सों में बँटा हुआ था। एक
हिस्से पर इंदौर के होलकरों का अधिकार था, तो दूसरे हिस्से पर
ग्वालियर के सिंधिया वंश का। थांदला नगर पश्चिम रेलवे की बड़ी लाइन
पर उदयगढ़ स्टेशन से उत्तर की ओर 5 कि.मी. दूर है। यहाँ जैनियों के
स्थानकवासी, मंदिर-मार्गी तथा दिगंबर आम्नायों के काफी घर हैं। तीनों
आम्नायों की निकट ज्ञात इतिहास में लगभग 20-22 भव्यात्माओं ने इस भूमि
में जन्म लेकर 'जैन भागवती दीक्षा' ग्रहण की है। जिनमें आचार्य पू.
श्री जवाहलालजी म.सा. आदि महान विभूतियाँ हैं।
इस
भू की महिमा क्या कहूँ?
यह भूमि सच में महान है।
इस धरती पर जन्म लिया वीरों ने
यह हीरों की खदान है।।
- और इसी थांदला नगरी में
स्थानकवासी परंपरा के घोड़ावत परिवार में हमारे आस्थेय, श्रद्धेय,
प्रवर्तक पू. गुरुदेव श्री उमेशमुनिजी म.सा. का जन्म हुआ है।
आइए, देखें हम उनकी कुल-परंपरा....
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