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पारिवारिक जन-
पूज्य श्री धर्मदासजी म. की पारिवारिक स्थिति का कुछ पता नहीं चलता
है। उनके माता-पिता के सिवाय उनके परिवार में कोई अन्य जन थे या नहीं-
इस विषय में कुछ भी उल्लेख प्राप्त नहीं है। परन्तु अनुमान से ऐसा
लगता है, कि आप अपने माता-पिता की इकलौती सन्तान नहीं थे। एक पुराने
पन्ने से ऐसी ध्वनि निकलती है, कि-आप के भाई भी आपके संग दीक्षित हुए
थे। परन्तु इसका कुछ भी पुष्ट प्रमाण नहीं है।
17ते सर्व मां वधु धर्मचुश्त अने वधु सुखी श्री जीवणलाल कालीदास हता
प्रभुवीर पट्टावली।18 ते तेमनी न्यात मां मुख्य मालक हता- मरुधर
पट्टावली, 16 प्रभुवीर प. । 20 प्रभुवीर प., 21 हस्त लि. मालवा प.,
22 आदर्श आचार्य अवतरण, 23 मरुधर-केसरी-अभिनंदन ग्रन्थ।
बाल्यकाल और अध्ययन-
जब आप गर्भ में थे, तब आपके माता-पिता दोनों की ही धर्म में भावना
विशेष बढ गई थी। अतः माता-पिता ने आपका नाम 'धर्मदास' रखा था। बचपन
से ही आपको साधु-सन्त बहुत प्रिय थे और उनका सत्संग भी बचपन से ही
प्राप्त था। सन्तजन की मधुर वाणी ने आपके पूर्व जन्म के उत्तम
संस्कारों को जागृत करके, उनकी महक से जीवन को सुवासित बना दिया। अपनी
उम्र के बच्चों की अपेक्षा आपकी बुद्धि अधिक विकसित थी। यों तो सरखेज
में संतो का आगमन होता ही रहता था। पर लोंकागच्छ के कोई न कोई यदि वहां
बने ही रहते थे। वे बच्चों को अक्षरज्ञान के बाद सूत्र-सिद्धांत का
अध्ययन भी कराते थे। बालक धर्मदासजी ने अन्यत्र अध्ययन किया या नहीं,
इसकी जानकारी नहीं मिलती। हो सकता है कि किसी पंडित की पाठशाला में
प्राथमिक अध्ययन किया हो। कुछ लेखकों के मत से ऐसा लगता है कि- वहां
लोंकागच्छी यदि पाठशाला चलाते थे।24 पर इसके लिए कोई प्राचीन प्रमाण
नहीं है। हाँ, बालक धर्मदासजी ने लोंकागच्छीय यतियों से सैद्धान्तिक
अध्ययन किया। 25 परन्तु वहाँ उनकी कोई पाठशाला थी,यह सिद्ध नहीं होता
है। क्योंकि सैद्धान्तिक अध्ययन तो यतियों के वहाँ आते-जाते रहने पर
और चातुर्मास होते रहने पर भी किया जा सकता है। आठ वर्ष की वय 26 से
आपका अध्ययन प्रारंभ होना लेखकों ने माना है। परन्तु आपकी बुद्धि
तीक्ष्ण होने के कारण और संतों के समागम में आते रहने के कारण, आठ
वर्ष की वय से पूर्व ही आपका अध्ययन प्रारंभ हो गया हो, तो कोई
आश्चर्य नहीं। किसी के मत से आपने लोंकागच्छीय यति केशवजी की पाठशाला
में, अन्य मत से केशवजी के पक्ष के यति तेजसिंहजी के पास,
सैद्धान्तिक अध्ययन किया और तीसरे मत से आपने एकल पातरिया श्रावक
कल्याणजी27 या पोतीयाबंद श्रावक प्रेमचंदजी से शास्त्रों का अभ्यास
किया। 28
अध्ययन कराने वाले व्यक्ति के नाम
के विषय में भले ही मतभेद हो पर उनकी ज्ञान प्राप्ति में लोंकागच्छ
और पोतियाबंध श्रावक अवश्य सहायक हुए।
सारांश यह है, कि बालक धर्मदासजी ने आठ वर्ष की वय से विधिवत्
अध्ययन प्रारंभ किया। जिज्ञासा तीव्र-तीव्रतर होती गई।उनका हृदय
पूर्व-संस्कार से ही धर्म के रंग में रंगा हुआ था। अध्ययन से वह रंग
और पक्का हो गया। 29 उनकी धर्मरुचि बढती जा रही थी। उनका बाल
व्यक्तित्व आकर्षण था। संत उनके कण्ठ-माधुर्य, जिज्ञासा भाव, विनय,
पुण्य-प्रभाव और आकृति के शुभ लक्षणों से सहसा प्रभावित हो जाते थे।
बाद में जब वे उनके बुद्धि वैभव और स्मृति-पटुता से परिचित होते तो
उन्हें ज्ञान देने में विलम्ब नहीं करते थे।
पन्द्रह वर्ष की वय में पहुँचने
तक तो धर्मदासजी ने अनेक सिद्धांतों का शास्त्रों का अध्ययन कर लिया।
उनकी तर्क-बुद्धि विकसित हो चुकी थी। कई विषयों में उनके
शास्त्रानुसारी स्वतंत्र निर्णय हो चुके थे। वे निर्णय कभी-कभी
प्रचलित संयम व्यवहार से विपरीत जाते थे। कभी-कभी उनके तर्कों से
यतिजन चौंक उठते थे।
लक्ष्य
का निर्णय-
जब शास्त्रों का अध्ययन करते हुए, उनकी बुद्धि का विशेष विकास हुआ,
तभी उन्हें अपने जीवन के लक्ष्य के विषय में विचार होने लगा। जिस वय
में बच्चों में तूफान, हठ और शैतानी होना चाहिए खेलने-कूदने की तरंगे
होनी चाहिए, उस बेफिक्र मस्तानी वय में ही बालक धर्मदासजी शान्त और
गंभीर बन गए थे। शास्त्रों के परिशीलन ने मानों उनके जन्मान्तर से
अर्जित दार्शनिक संस्कारों को जगा दिया था। उनकी स्थिर नयन-कीकियों
के पीछे अथाह विचार-सागर लहराता हुआ-सा लगता था। ऐसा शान्त बालक,
जिसने अभी बचपन की दहलीज को पार करने की तैयारी ही की हो, किसे न
प्रिय लगता। परन्तु शास्त्रगगन में उडान भरने वाले हृदय-विहग को,
सुदूर जीवन-क्षितिज को भेदने का भाव विह्वल कर रहा था। अतः न तो उन्हें
घर की दीवारें आकर्षित करती थी और न जन-जन की दीवारें ही। उनके
अन्तर्नयन ने जीवन के लक्ष्य को पा लिया। पन्द्रहवें वर्ष के लगते ही
उनकी सगाई की बातें आने लगी। इस स्थिति ने उन्हें और भी विचार में
डाल दिया।
उस युग में एक दशक के भीतर ही वय
में ही विवाह कर दिए जाते थे। उन बच्चों को पूछने का तो कोई प्रश्न
ही नहीं उठता था। ऐसे समय में बालक धर्मदासजी के हृदय में भयंकर
संघर्ष उठ खडा हुआ। पर वे साहसी थे। उन्होंने अपने पिताजी के सामने
अपने निर्णय को प्रकट करने का विचार किया। आखिर कोई प्रसंग खोजकर,
धर्मदासजी ने अपने विचार पिता के सामने स्पष्ट रूप से रख दिए। पिता
के सामने स्पष्ट रूप से रख दिए। पिता जीवणजीभाई पहले तो अवाक् उनकी
ओर देखते रहे। फिर उनकी धर्मभावना ने पुत्र की बात पर सदाशय से विचार
करने को प्रेरित किया। उन्होंने पहले से ही पुत्र की धर्म भावना के
मोड को देखा था। अतः जीवणभाई ने पूछा, 'क्या तुम विवाह करना नहीं
चाहते होङ्क्ष क्यों साधुता को ग्रहण करना चाहते हो।'
धर्मदासजी ढता-पूर्वक बोले 'मैंने
अनगार धर्म ग्रहण करने का निर्णय अभी नहीं लिया है, पर विवाह करने की
मेरी इच्छा बिलकुल नहीं है। मुझे इन सांसारिक प्रवृत्तियों में जरा
भी रस नहीं है।'
जीवणजीभाई ने गंभीर होकर कहा, 'संसार
की प्रवृत्तियों में तुम्हें रुचि नहीं है, सो तो मैं देख ही रहा
हक्तँ। अच्छा, फिर इस विषय में विचार करेंगे।'
इसके बाद जीवणजी भाई धर्मदासजी की सगाई की बात टालते रहे। इधर
धर्मदासजी खुद ही दुविधा में पडे हुए थे। वे सोच रहे थे, कि- 'मैंने
समस्त वासनाओं से, कषायों से और कर्मों से मुक्त होने का अपने शुद्ध
स्वरूप को प्रकट करने का लक्ष्य बनाया है। पर अपने लक्ष्य की सिद्धि
के लिए मैं यति बनूँ या श्रावक ही रहक्तँङ्क्ष'
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