अणु का साहित्य
श्री अन्तगडदसा सूत्र के संदेश

वि.सं. 2051 का वर्षावास पूज्य गुरुदेव का रतलाम शहर में था। वहाँ पर भी आपने श्री अन्तगडदसा सूत्र पर व्याख्यान फरमाए। इसके विषय थांदला में दिए व्याख्यानों के विषयों से भिन्न थे। रतलाम में पर्युषण पर्व के दौरान आपश्री के व्याख्यानों का संग्रह है - 'श्री अन्तगड-दसा सूत्त के संदेश'।

इसमें आए आठ दिनों के व्याख्यानों के विषय :
(1) पर्युषण में अन्तगड ही क्यों? धर्मी से धर्म अलग नहीं/पर्व का अर्थ, भेद, प्रयोजन और चयन/पर्युषण शब्द का अर्थ/शास्त्रों की प्रासंगिकता/उन्हें क्यों वांचना?/शास्त्र-मार्गदर्शक, सिद्धिदाता/अन्तगड वाचन ही क्यों?

(2) अन्तगडदसा की रचना-प्रणाली से प्राप्त संदेश :

नवीनता/विषय-कषाय पुराने हैं या नए?/तीन युगलों के मध्य आगम संवाद/जहाँ विकार-वहाँ विकास/विनय का प्रादुर्भाव/जम्बुस्वामी की प्रासंगिकता/त्याग का अभिमान न करें/विनयधर्म की आवश्यकता/विनय के विभिन्न भेद/विनय के विभिन्न लाभ।

(3) भव का मूल - भोग वृत्ति : भोग और भोगवृत्ति का स्वरूप/भोगवृत्ति समस्त जीवों में/परिग्रह और आरंभ की जननी/वैभव का वर्णन क्यों?/लोक में धन की महिमा/पागल कौन?/भोगवृत्ति से परिग्रह संज्ञा/परिग्रह से गौरव? आत्म विस्मृति/परिग्रह में ममता क्यों?/पुण्य से बंधी है लक्ष्मी/गौरव त्याग से ही जय/संसार-राग से उपरत बनें।

(4) परिग्रह से हानि : कामनाएँ और उनका वर्गीकरण/धन तो हेय है/देव-पूजन किसलिए? साधन कभी भी साध्य नहीं होता/परिग्रह संज्ञा कब से? /पुत्रैषणा/माँ की इच्छा के लिए अट्ठम। कामनापूर्ति के दो मार्ग - देवपूजा और श्रम/पुत्र-द्वेष भी होता है।

(5) भोग का नशा और नशे का भोग : भोगवृत्ति में सम्यक्‌-चिन्तन का अभाव/साधु अकर्मण्य कैसे? /बाह्य-सकर्मण्यता, विनाश का हेतु/भोगी को छूट आजादी का अनर्थ/यथार्थ के नाम पर कंकर क्यों बिनते हो?/आजादी या स्वच्छंदता/नशा सेवन : हास्यास्पद स्थिति।

(6) कौन जागा? : दो ही तीर्थंकर के शासन का वर्णन क्यों?/आसक्ति ही परिग्रह/क्या खाते? हीरे-मोती या रोटी/पापमूल परिग्रह/हृदय पर चोंट - परिग्रह से मुक्ति/अटूट आस्था ङ्क्ष जागरण की भूमि/बुद्धिमान कौन; जागे वह या सोए वह/मृत्यु का भय क्यों दिखाते हैं?/अप्रमाद धर्म का एवं प्रमाद पाप का मार्ग/प्रमाद से हानि एवं अप्रमाद से लाभ।

(7) आस्था के रूप और फल : मनुष्य आस्था-विहीन नहीं/आस्था का वर्गीकरण-

(1) बाह्य पदार्थों में (2) नैतिकता में (3) दिव्य-शक्तियों में (4) वीतराग दर्शन में आस्था एवं इनके विभिन्न प्रभेद।

(8) भावधर्म का शिखर-क्षमापना : बाह्य-आभ्यन्तर-तप :

अन्योन्याश्रित/प्रायश्चित-दोष दर्शन/निन्दा करें, परन्तु किसकी?/प्रतिक्रमण = प्रायश्चित/क्षमापना, प्रतिक्रमण का एक अंग है/क्षमा और क्षमापना में भेद/क्षमादान के तीन रूप/उपकारी-अपकारी को एवं आत्मष्टि से क्षमादान/क्षमायाचना कैसे, कौन करे/क्षमा के प्रकार।