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मोक्ष पुरुषार्थ के इस अंतिम भाग में अन्तिम चार बोलों
पर विवेचन है। इनके विषय क्रमश: पौषधोपवास, आवश्यक, जागरण एवं
समाधिमरण हैं। इनमें आए प्रमुख बिन्दु निम्नानुसार हैं :
इक्कीसवाँ अध्ययन :
बोल क्र. 20- महिने में छह-छह पौषध करें तो जीव वेगो-वेगो मोक्ष में
जाय।
बोल का क्रम औचित्य/पौषध-उपवास की आवश्यकता/निवृत्ति/साधु भी और
श्रावक भी पौषध करे/पौषध का कारण/उपवास का विकल्प/श्रावक के लिए
विधान/गृहस्थ के पौषध का स्वरूप/चार प्रकार के पौषध/चार प्रकार के
पौषध का स्पष्टीकरण/काल की अपेक्षा पौषध के भेद/कुछ स्थविरों से
समस्त नई परंपरा/पौषध में अवश्य करणीय नियम/देश-पौषध की विविधता/पौषध
में निर्दोषता/पौषध व्रत में बहुमान और अनुभव/पौषध का स्पर्शन और
पालन/पौषध की प्रतिज्ञा और अन्य विधि/पौषध में दिनचर्या/सूचना और
सान्ध्य क्रिया/पौषध में रात्रिचर्या शयन के पहले और बाद में पिछली
रात में करणीय कृत्य/प्रत्याख्यान और बाद में/पौषध पारना/पारणे का
समय/उपसंहार/अतीत के उदाहरण/व्रत आराधना का फल/चूलिका।
बावीसवाँ अध्ययन :
बोल क्र. 21- उभयकाल आवश्यक करे तो जीव वेगो-वेगो मोक्ष में जाय।
बोल का क्रम औचित्य/आवश्यक की आवश्यकता/आवश्यक के प्रमुख दो भेद/आवश्यक
के कार्य/अनुष्ठान-आवश्यक के त्याग से प्रमाद/आवश्यकों का स्वरूप-
(1) सामायिक/उसके भेद/श्रावक का सामायिक व्रत/क्रिया रूप सामायिक
आवश्यक/सामायिक-अनुष्ठान आवश्यक/इसमें की जानेवाली क्रियाएँ।
(2) क्रिया रूप चतुर्विंशति आवश्यक/चतुर्विंशति-स्तव-अनुष्ठान आवश्यक।
(3) वंदना के प्रसंग (वंदना-क्रिया)/वन्दनीय के संबंध में प्रश्न/वन्दनीय
के प्रकार/प्रत्यक्ष-परोक्ष वन्द्यों को वन्दना/प्रत्यक्ष वन्दना
परोक्ष को भी/इसके संभावित कारण।
(4) प्रतिक्रमण का स्वरूप/दो प्रकार/प्रतिक्रमण-क्रिया के स्थान/अनुष्ठान
प्रतिक्रमण/प्रतिक्रमण के प्रभेद/प्रतिक्रमण का विषय/आवश्यक का सार/तीर्थंकर
भगवन्तों के शासन में प्रतिक्रमण आराधक कौन?
(5) कायोत्सर्ग का स्वरूप/अनुष्ठान कायोत्सर्ग में लोगस्स पाठ/अन्य
समय में कायोत्सर्ग/कायोत्सर्ग के भेद/निरालम्ब कायोत्सर्ग में
अशुद्धि/निरालम्ब कायोत्सर्ग में संलग्नता का कारण और उसका दोष/कायोत्सर्ग
में लोगस्स क्यों?/कायोत्सर्ग में उत्पन्न होने वाले दोष/कायोत्सर्ग
की प्रेरणा।
(6) पच्चक्खाण-आवश्यक (प्रेरणा)/पच्चक्खाण के भेद/दैनंदिन
प्रत्याख्यान कौन से/जिनशासन का मूल/पाप नहीं करना ही पर्याप्त नहीं/पाप
से अविरत अविश्वसनीय/प्रत्याख्यानी के योग शस्त्र/भोगों का त्यागी/अभोगी
संयत/प्रत्याख्यान-गुण धारणा/सदा प्रत्याख्यान धारें/उपसंहार -
आवश्यकता की प्रतिक्रमण संज्ञा क्यों? /आवश्यक में आत्मा और आत्मा
में वह/आवश्यक की पूर्णता में मुक्ति/चूलिका।
तेवीसवाँ अध्ययन :
बोल क्र.22 - पिछली रात में धर्म-जागरण करे तो जीव वेगो-वेगो मोक्ष
में जाय।
बोल का क्रम औचित्य/जागरिका के भेद/जागृति के क्षणों में उद्यम/जागने
में कठिनाई/मूर्च्छा से चेतना का दु:ख तीव्र/अधोगामिनी चेतना/ भक्तासक्त
मुनि और भोगासक्त गृही/जब तक सोना/सूर्योदय तक और सूर्यास्त में सोना/साधु
अल्पनिद्रा ले/श्रावक भी धर्म जागरण करे/पूर्व रात्रि में जागरणा/अपररात्रि
में जागरण/जागरण का महत्व/जागृति के पश्चात कर्तव्य/चिन्तन का स्वरूप/साधु
का अगला चिन्तन और रात्र्यन्त कर्तव्य/श्रावक के प्रात:कालीन कर्तव्य/उपसंहार/चूलिका
गाथाएँ।
चौबीसवाँ अध्ययन:
बोल क्र. 23- अन्तिम समय में आलोचना करे - प्रतिक्रमण से शुद्ध होकर
समाधि-पण्डित मरण मरे तो जीव वेगो-वेगो मोक्ष में जाय।
इस अध्ययन में पाँच परिच्छेद हैं।
प्रथम परिच्छेद
बोल का क्रम औचित्य/मृत्यु का भय/मृत्यु अनिवार्य है/जन्म
के साथ मृत्यु/देहत्याग से हानि नहीं/मृत्यु उपकारी मित्र/आराधना से
मृत्यु प्रसन्न/मरण की आराधना क्यों?
द्वितीय परिच्छेद - मरण के भेद
जिज्ञासु का प्रश्न/मरण के पुन: दो भेद/सभी भिक्षुओं का मरण श्रेष्ठ
नहीं/विरति-विहीन का बालमरण/सकाम मरण के दो भेद/साधु-श्रावक के मरण
के भेद/समाधि-मरण का स्वरूप/परभव और मुक्ति का द्वार/आराधकों का
उल्लेख/मतान्तर/आसन्न भूतकाल के उदाहरण/उपसंहार।
तृतीय परिच्छेद - समाधि-मरण किसका?
समाधिमरण किसका?/संलेखना का समय/संलेखना के भेद/मुनियों की
व्यवहार-संलेखना/श्रावक की संलेखना/मुनियों की आहार संलेखना/तीन
प्रकार की आहार-संलेखना/संलेखना के अन्य क्रम/आहार संलेखना का लाभ/भाव
संलेखना आराधना दोष-भाव संलेखना/संक्लेश भाव-संलेखना/ गृहस्थ की
संलेखना/साधक की तत्परता/प्रतिक्षण तैयार/फिर भी संलेखना का
माहात्म्य/अप्रमत्त साधक की संलेखना/भाव संलेखना में तत्परता।
चतुर्थ परिच्छेद - आलोचना
अन्तिम समय में आलोचना/आलोचना सुनने वाले की खोज/आलोचना श्रोता के
अभाव में करणीय विधि/आलोचना के भेद/पवित्रता का अनुभव/आत्म-धिक्कार
और आत्म-धन्यता/साधक की अन्तिम भावना/असमर्थ हेतु विधान।
पंचम परिच्छेद - समाधि-धारण
अनशन के भेद/अनशन के कौनसे भेद का प्रसंग/असमाधि के कारण/क्षोभ-हरण
का उपाय/समाधि-स्वरूप/प्रत्याख्यान की प्रेरणा/भवचरिम- प्रत्याख्यान
विधि/भक्त-परिज्ञा का स्पष्टीकरण/सुभावना और अन्य क्रियाओं का विधान/पय-गुण
दारं/पदों का स्मरण/गुणों का स्मरण/अरिहंत के चार अतिशय/
अपाय-अपगम-अतिशय/स्वाश्रित अपाय-अपगम अतिशय (अठारह दोष रहितता)
पराश्रित अपायापगम अतिशय/ज्ञानातिशय/वचनातिशय/
पूजातिशय/अरिहन्त भगवान के गुण/सिद्ध प्रभु के गुण/आचार्य के गुणों
का स्मरण/उपाध्याय के गुणों का स्मरण/साधु के गुणों का स्मरण/पद-गुणों
का स्मरण/नमस्कार पाठ द्वार/शरण-ग्रहण द्वार/सुकृत-अनुमोदन द्वार/अनात्म-भावना
द्वार/अहंकार विसर्जन/अनात्म भावना के तीन प्रकार (अ)
देह-अनात्म-भावना शरीर सप्तक, पर-उत्पाद धर्म-रहितता (आ)विकार-अनात्म
भावना (इ) कर्म-अन्यत्व-भावना/ममत्व विसर्जन/साधुओं का भावनाभ्यास/उपासक
का भावनाभ्यास/भावनाभ्यास का नमूना।
(6) आत्म-भावना-द्वार (7) प्रवचन-प्रतिपत्ति-चिन्तन-द्वार/सात द्वारों
का उपसंहार/परिच्छेद एवं अध्ययन का उपसंहार/चूलिका/प्रशस्ती और
रचनाकाल।
परिशिष्ट विभाग : पहला परिशिष्ट-तेवीस बोल/दूसरा परिशिष्ट -पौषध के
अठारह दोष एवं पौषध के अन्य मत से इक्कीस दोष।
मोक्ष-पुरुषार्थ का यह सातवाँ भाग सर्वाधिक गाथाओं को अपने में समाए
हुए है। चारों अध्ययनों में क्रमश: 38, 156, 33 एवं 388 अर्थात् कुल
615 गाथाएँ हैं। इसमें मात्र तीन कथाएँ हैं। |