अणु का साहित्य
मोक्ष-पुरुषार्थ : भाग-2

इसमें बोल क्र. 8, 9, 10 अर्थात्‌ तीन बोलों पर विवेचन है। पहले भाग में सात बोलों पर विवेचन था एवं आठ अध्ययन थे। मोक्ष-पुरुषार्थ भाग-2 में आए विषयों का संक्षिप्त परिचय निम्नानुसार है :

नौवाँ अध्ययन : बोल क्र. 8 - सद्ज्ञान भणे-भणावे तो जीव वेगो-वेगो मोक्ष में जाय।

प्रथम परिच्छेद - सद्ज्ञान
मंगलाचरण और भावना/बोल का क्रम औचित्य/श्रुत ही शासन/श्रुत अभ्यास की प्रेरणा/ज्ञान-परीक्षा की प्रेरणा/ज्ञान परीक्षा में परीक्षणीय विषय/वक्ता-परीक्षा/दोषों के अभाव में अपूर्णता का खण्डन/निष्पक्ष लौकिक आप्तता की अनाप्तता का कारण/प्रामाणिक वक्ता/आप्त-पुरुष की विशेषताओं की महिमा/अन्य प्रामाणिक वक्ता/श्रुत-परीक्षा - तीन कसौटी/सम्यक्‌ श्रुत की चार पहचान/चित्त-परीक्षा/चित्त के सात दोष/श्रुत अभ्यास की प्रेरणा।

दूसरा परिच्छेद-भणे (अभ्यास)
ज्ञान पढ़ने का उद्देश्य/श्रुत ज्ञान किससे ग्रहण करें? /श्रुतज्ञान की ग्रहण विधि/श्रुत ग्रहण का क्रम/गुरु से श्रुत-ग्रहण करने का कारण/सूत्र कण्ठस्थ करें/सूत्र याद करने का लाभ/सूत्र का अर्थ जानना/पृच्छा का वर्णन/अर्थ-विनिश्चय का स्वरूप/अर्थ-अभिगम का स्वरूप/अज्ञान-निवारण का फल/अन्य पूरक ग्रंथ पढ़ना/श्रुत ग्रहण के समय तप/रस अप्रतिबद्धता/दूषित आहार से मति दूषित/विधिवादी की धन्यता/पढ़ने के बाद भी पढ़े/परिवर्तना की विधि/परिवर्तना की आवश्यकता और फल/अनुप्रेक्षा का स्वरूप/अनुप्रेक्षा का कार्य और फल/अभ्यास की सम्यक्ता की परीक्षा।

तीसरा परिच्छेद - भणावे (ज्ञानदान)
श्रुतधर का अवलोकन/ज्ञानी की अनुकंपा प्रवृत्ति/ज्ञानियों की ज्ञानदान प्रवृत्ति/धर्म कथा/पृच्छना-वाचना/गृहस्थ ज्ञानी का ज्ञान दान/श्रुत दानियों को धन्यवाद/स्वयं द्वारा श्रुत-सेवा का आह्वान।

दसवाँ अध्ययन : बोल क्र. 9 - एक कोटि से लीधा पच्चक्खान नवकोटि से पाले तो जीव वेगो-वेगो मोक्ष में जाय।
बोल का क्रम औचित्य/ज्ञानी का चिन्तन/व्रत विधि का ज्ञान/अंशत: व्रत ग्रहण/आराधक की भावना/साधक की आराधना/आराधना भाव।

ग्यारहवाँ अध्ययन : बोल क्र.10 - दस प्रकार की वैयावच्च करे तो जीव वेगो-वेगो मोक्ष में जाय।

वैयावृत्य-आवश्यकता/वैयावृत्य की परिभाषा/सेवा और वैयावृत्य में अन्तर/वैयावृत्य के भेद।

आचार्य वैयावृत्य: आचार्य का स्वरूप/आचार्य से पहले कौन? /तीर्थंकर के पश्चात/आचार्य की वैयावृत्य के प्रकार/शान्ति उत्पादन-वैयावृत्य/कार्य साधन वैयावृत्य/आज्ञापालन वैयावृत्य।

उपाध्याय वैयावृत्य: उपाध्याय का स्वरूप/उपाध्याय महाराज का उपकार/उपाध्याय वैयावृत्य के तीन प्रकार- आलंबन वैयावृत्य-संबाधना वैयावृत्य/ सहायता वैयावृत्य/उपाध्याय वैयावृत्य के फल।

स्थविर वैयावृत्य : स्थविर परिभाषा/स्थविर के प्रकार/स्थविरों की महिमा/स्थविरों की वैयावृत्य/स्थविरों की वैयावृत्य के प्रकार और फल।

तपस्वी की वैयावृत्य: तपस्वी कौनङ्क्ष/विभिन्न तपस्वियों की वैयावृत्य/तपस्वियों की वैयावृत्य का फल।

नवदीक्षित की वैयावृत्य: नवदीक्षित की स्थिति/दो प्रकार के आलंबन/शैक्ष्य वैयावृत्य का स्वरूप।

ग्लान की वैयावृत्य: ग्लान की अवस्था/ग्लान की वैयावृत्य का स्वरूप।

साधर्मिक वैयावृत्य: साधर्मिक स्वरूप/परस्पर वैयावृत्य की आवश्यकता/साधु की साधु के प्रति - साध्वी के प्रति/श्रावक-श्राविकाओं की परस्पर वैयावृत्य/वैयावृत्य लेने-देने के संबंध में शिक्षा।

कुलादि वैयावृत्य: परिभाषा/गुरुकुल का महत्व और उसकी वैयावृत्य के प्रकार/गण की वैयावृत्य/संघ की वैयावृत्य/व्यष्टि और समष्टि की मर्यादा।

वैयावृत्य का फल: वैयावृत्य की दुष्करता/फल/चूलिका।

इस दूसरे भाग में कुल 269 गाथाओं पर विवेचन है। अनेक ऐतिहासिक, नवीन एवं वास्तविक दृष्टांत हैं। इसके प्रकाशक पूज्य श्री नंदाचार्य साहित्य समिति मेघनगर है। प्रथम संस्करण ई. सन्‌ 1990 एवं द्वितीय संस्करण ई. सन्‌ 1998 में प्रकाशित हुआ।