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यह पुस्तक पूज्य गुरुदेव द्वारा पेटलावद वर्षावास
(सं.2048 सन् 1991) में दिए गए व्याख्यानों पर आधारित है। दशवैकालिक
सूत्र के पहले, दूसरे एवं तीसरे अध्ययनों पर दिए गए, कुल सत्रह
व्याख्यान इसमें हैं। इनकी विषय वस्तु इस प्रकार है -
प्रथम चार व्याख्यान भूमिका रूप हैं, जिनमें मंगल/मंगलाचरण/आगम ज्ञान
की आवश्यकता/दशवैकालिक सूत्र के विषय का निर्देशन/दशवैकालिककी रचना
और रचयिता पर विवेचन है।
पाँचवाँ व्याख्यान दशवैकालिक सूत्र के प्रथम अध्ययन पर आधारित है
जिसमें धर्म, जीवन और आजीविका पर प्रकाश डाला गया है। दूसरे अध्ययन
के सार-रूप छठा एवं सातवाँ व्याख्यान है। जिनमें मुख्य विषय 'अपने से
मत डरो' एवं 'मन से मत हारो' हैं। तीसरे अध्ययन की भूमिका रूप आठवाँ
एवं नौवाँ व्याख्यान है। इनके मुख्य विषय ''आचार में निषेध और विधि/निषेध
विधि का आधार/निमित्त- उपादान'' है।
दसवें व्याख्यान से साधु के अनाचारों के कारणों के साथ अनाचारों का
वर्णन प्रारंभ होता है जो पन्द्रहवें व्याख्यान में पूर्ण होता है।
अनाचारों का सेवन प्राय: शरीर के लिए ही होता है, अत: शरीर भी इन
व्याख्यानों में लक्ष्य है। सोलहवें व्याख्यान में तीसरे अध्ययन की
शेष गाथाओं के मुख्य भाव 'सरलता' का वर्णन है। लौकिक सरलता/लौकोत्तर
सरलता/सरलता के विषय में गलत समझ आदि व्याख्यान के मुख्य बिंदु हैं।
सत्रहवाँ व्याख्यान स्वच्छंदता पर है। इसके अंतर्गत स्वच्छंदता के
कारणों तथा साहित्य, समाज, कुल एवं धार्मिक क्षेत्रों की स्वच्छन्दता
पर विचार किया गया है।
इसके पश्चात दो परिशिष्ट हैं। प्रथम परिशिष्ट में तीन विभागों में
दशवैकालिक सूत्र के प्रथम तीन अध्ययनों का संक्षिप्त विवेचन है।
द्वितीय परिशिष्ट में इसी आगम के प्रथम दो अध्ययनों का पद्य में
संक्षिप्त विवेचन है। लक्ष्य की ओर का प्रकाशन सं. 2050 सन् 1993
में हुआ। प्रकाशक पूज्य श्री नन्दाचार्य साहित्य समिति, मेघनगर है। |