अणु का साहित्य
लग्न की बेला (उपन्यास)

पूज्य मालव केसरी श्री सौभाग्यमलजी म.सा., कविवर्य प्रवर्तक पू. श्री सूर्यमुनिजी म.सा. आदि 10 संतों का बदनावर में संवत्‌ 2030 का चातुर्मास हुआ। तब गुरुदेव श्री ने गुरुभ्राता स्व. श्री सुरेंद्रमुनिजी म. की प्रेरणा से 'लग्न की बेला' उपन्यास लिखना प्रारंभ किया। लेकिन संवत्‌ 2031 के रतलाम वर्षावास बाद गुरुभ्राता का देहावसान होने से 'लग्न की बेला' का लेखन बंद हो गया। फिर संवत्‌ 2044 में पूना सम्मेलन में जाते वक्त मार्ग और शेष कोपरगाँव में पूर्ण हुआ।

इस उपन्यास की कथा गुरुदेव ने भूरालालजी पोरवाड (कोटा) से बीज रूप में सुनी थी। इसका मूल रत्रोत प्राचीन ग्रंथों में उपलब्ध नहीं हुआ। उसी कहानी का पल्लवित-विस्तृत रूप है - यह उपन्यास। यह उपन्यास सोश्य लिखा गया है। नगर श्रेष्ठी का पुत्र अरुण बचपन से आचार्य मुनिचंद्रजी के सत्संग से वैराग्य-वासित हृदयवाला बना। लेकिन युवावय में आते ही राग और वैराग्य के द्वंद्व में कामराग से खींचा हुआ स्वयंप्रभा से विवाह के लिए रवाना हुआ। वहाँ लग्न-मण्डप में परस्पर माल्यारोपण करते हुए जाति स्मरण ज्ञान हो गया- दोनों को। पिछले दो भवों को जाना। अरुण था धनपति और स्वयंप्रभा थी उसकी प्रिया धनवती। उसने प्रिया के राग से चालीस कौओं का वध किया और वह मरकर पहले नरक में उत्पन्न हुआ तथा धनवती उसके वियोग में सती होकर परमाधार्मिक देव बनी, जो अपने प्रिय को अपने लिए किए हुए पाप की सजा देती थी। वहाँ भावी तीर्थंकर के निमित्त से धनपति नारक को बोधिलाभ हुआ। नरक से निकलकर धनपति अरुण बना और परमाधार्मिक बना 'स्वयंप्रभा'। अपने पूर्वभव की कहानी दोनों लग्न-मण्डप में सुनाकर विवाह से विरत हो गए और श्री धर्मप्रियाचार्य के सानिध्य में दोनों ने प्रव्रज्या ग्रहण की।


वैराग्य में राग की वेलि उत्पन्न हुई और उसमें वैराग्य के फूल खिले, जिससे वह राग की वेलि मुरझा गयी। अत: 'लग्न की वेला' साधना का द्वार बन गयी। इस कहानी का प्रतिपाद्य यही है कि ''कामरागरूप प्रेम भी शाश्वत नहीं है। वासनाजनित प्रेम इसी भव में क्षीण हो जाता है। मैथुन सुख- स्त्रोत नहीं है''- यह दृष्टि प्रदान करना इस कृति का उद्देश्य है। गुरुदेव का यह एकमात्र उपन्यास है। फिर भी उपन्यास की भाषा-शैली, लेखन-शैली वर्तमान के वातावरण का हक्तबहक्त वर्णन करने में समर्थ है। एक बार प्रारंभ करने के बाद हर क्षण उत्सुकता बनी रहती है और पाठक वर्ग पढ़ना पूर्ण होने पर ही विराम लेता है। यह उद्देश्यपूर्ण, सद् शिक्षा का बोध देनेवाला और रोचक उपन्यास है!