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इस भाग में बारहवें, तेरहवें, चौदहवें एवं पन्द्रहवें
अर्थात् चार बोलों पर विचार किया गया है। इनके विषय क्रमश: क्षमा,
पाप की आलोचना, लिए हुए व्रत प्रत्याख्यान का निर्मल पालन एवं अभयदान
सुपात्र दान हैं। चार अध्ययनों के चार कथा परिशिष्ट हैं जो द्वितीय
संस्करण में सम्मिलित किए गए हैं। चारों अध्ययनों में आई विषय-वस्तु
संक्षिप्त में निम्नानुसार है -
तेरहवाँ अध्ययन : बोल क्र. 12
छती शक्ति क्षमा करे तो जीव वेगो-वेगो मोक्ष में जाय।
बोल का क्रम औचित्य/बली के लिए क्षमा दुर्लभ/शक्ति के प्रकार।
(1) धनशक्ति द्वार : धनिक अपमान सहन नहीं कर सकता/दुर्लभ धनिक/धर्म
वल्लभ-धनिक/उपासक धनिक।
(2) जनशक्ति द्वार : भक्त-शक्ति से संघभेद/मान सम्मान से दोष वद्धि/
सत्त्वशाली साधक/स्वजन शक्ति से तेजस्वी कृष्ण वासुदेव/साधारणजनों की
शक्ति/संघनायक जागरूक होना चाहिए/असहिष्णु और सहिष्णु नेता/परवश नेता/सफल
नेता।
(3) आधिपत्य द्वार : आधिपत्य शक्ति उसके प्रकार/अधिकारों में
प्रसन्नता का कारण/अधिकार पाकर क्षमा धारण करो/घोर अपराधी पर भी
माध्यस्थ भाव।
(4) कार्यशक्ति द्वार : शरीर बल की महिमा/पूर्व पुण्य से प्राप्त
बलवाला/ व्यायामादि से प्राप्त बलवाला/शरीर-शक्ति के स्वामी बाहुबली/किसका
देहबल श्रेष्ठ :
(5) आभ्यन्तर शक्ति द्वार : आभ्यन्तर शक्ति के प्रकार/विद्यावान आदि
के लिए असह्य बातें।
(6) शक्तिमतों से विनम्र निवेदन : आत्मगुणों का गर्व मत करो/औदयिक
भाव से निष्पन्न भावों में माहात्म्य मत मानो/शक्तिमान इच्छा का
निरोध करे/इच्छा निरोध से निर्जरा।
(7) शक्तिमान साधकों का चिन्तन :
परिशिष्ट : तेरहवें अध्ययन की गाथाओं में जिन कथाओं का संकेत किया गया
हैं, वें इस परिशिष्ट में हैं। इसके अन्तर्गत सात कहानियाँ हैं।
चौदहवाँ अध्ययन : बोल क्र. 13 :
लगे हुए पाप की तुरंत आलोचना करे तो जीव वेगो-वेगो मोक्ष में जाय।
बोल का क्रम औचित्य/पापों को समझना और उनसे दूर होना कठिन/आगम प्रमाण
और तर्क/पाप की परिभाषा में मतभेद/मतभेद में मान्य पुरुष का निर्देश/पाप
की परिभाषा/पाप के तीन अंशों का स्पष्टीकरण/पाप के पुन: दो विभाग/क्रियमाण
पाप के एक सौ आठ भेद/क्रियमाण पाप का दूसरा प्रकार/ कृत पाप के भेद/दोनों
के प्रधान रूप से कार्य के प्रकार/आलोचना के विषय में पृच्छा/कौन से
पाप का क्या उपाय? /अनभ्यास का स्वरूप/दोषों की उपेक्षा नहीं करें।
पाप की भीति : पाप से क्यों डरना? /पाप करके खुश मत होओ/पाप से जल्दी
दूर होओ।
पाप का मुधर लगना चिन्त्य : ज्ञानी का आश्वासन एवं उपाय/तीन भावनाएँ।
आलोचना का स्वरूप : आलोचना के लिए शीघ्रता/आत्म-निरीक्षण करें/आलोचना
में ऋजुभाव/पाप की स्वीकृति एवं उनकी निवृत्ति के भाव/पश्चाताप आलोचना
की विधि/निवेदन आलोचना की विधि/आलोचना शब्द से वर्तमान में गृहीत भाव/आलोचना
की प्रचलित अन्य विधियाँ।
आलोचना में बाधक मानसिक स्थिति : आलोचना से संबंधित आशंका/ आशंका का
समाधान/आलोचना में शीघ्रता/उपसंहार-चूलिया।
परिशिष्ट : चौदहवें अध्ययन की गाथाओं में संकेत रूप से आयी कथाओं का
समावेश परिशिष्ट में है। इसमें 4 कहानियाँ हैं।
पन्द्रहवाँ अध्ययन : बोल क्र.
14 : लीधा व्रत-पच्चक्खाण निर्मल पाले तो जीव वेगो-वेगो मोक्ष में
जाय।
बोल का क्रम औचित्य/ग्रहण करने पर व्रत प्रत्याख्यान/व्रत बन्ध होता
है? /व्रत विकल्प नहीं है/अव्रत का त्याग कौन करता है? /जीव व्रत से
बंधा है या अव्रत से? /अव्रत या अविरति का अभाव कैसे हो? /व्रत किससे
कब होता है? /व्रत से कर्म बंध नहीं/मतान्तर का निषेध/देवायु बंध का
स्पष्टीकरण/व्रत-विरोधी अध्यात्मवाद के जन्म का हेतु/वर्तमान में
अध्यात्मवाद की स्थिति/अध्यात्म और सत्क्रिया में द्वन्द्व का कारण।
अध्यात्म और व्रत का अविरोध/अविरोध की सिद्धि
साधना का राजमार्ग/व्यवहार-निश्चयनय की संधि/इस मार्ग के निर्माता और
पथिक/बोल में प्रयुक्त व्रत और पच्चक्खाण शब्द का आशय/व्रत और
पच्चक्खाण के कार्य
व्रत में अशुद्धि के कारण : मन की दुर्बलता के कारण/दीर्घ तप के राग
से भी व्रत की अवहेलना होती है/लोकोपकार की वृत्ति से धूर्तता/तप-संयम
की सत्ता जमाने के भाव से उनमें मलिनता/जन साहस की हत्या।
व्रत प्रत्याख्यान की मलिनता के हेतु का निवारण : दोष-हेतु जानों/व्रत-भाव
का स्मरण करो, उपकार के नाम पर भ्रमित मत बनों/हम भगवान से बडे नहीं
हैं/व्रतादि को मलिन बनाने वाले भावों को ऐसे मानों/प्रमाद छोडो/अप्रमत्त
को मोक्ष दूर नहीं/चूलिका अप्रमाद का आह्वान।
परिशिष्ट : इसमें सात कथाएँ है जो पहले संस्करण में नहीं दी गई थी एवं
जिनका संकेत पन्द्रहवें अध्ययन की विभिन्न गाथाओं में दिया गया है।
सोलहवाँ अध्ययन : बोल क्र. 15 :
अभयदान-सुपात्रदान दे तो जीव वेगो-वेगो मोक्ष में जाय।
बोल का क्रम औचित्य/अभयदान-सुपात्रदान कब घटित/अभयदान में प्रमोद का
अभाव अन्य गुणों को पनपने नहीं देता/धर्म के भेद/धर्म से प्राप्त लाभ/चतुर्विध-धर्म
में दान का प्रसंग/दान का स्थान पहला क्यों? /परिग्रह संज्ञा की
भयंकरता/परिग्रह संज्ञा के जय के लिए दान एवं उसकी परिभाषा/दान के
भेद/अनुकंपा दान/देय पदार्थ/उचित दान/कीर्ति दान/औषधि दान/ज्ञान दान/मोक्ष
के हेतु रूप दान/सुपात्रदान में विकल्प का कारण/सुपात्रदान की विशेषता
के हेतु/सुपात्रदान/सुपात्रदान का फल/सुपात्रदान का उपसंहार/अभयदान/धर्म
का दान-परम दान/धर्मदान श्रेष्ठ क्यों? /अभयदान की प्रेरणा/उपसंहार।
चूलिका : सुपात्रदान की अनुमोदना/अभयदान का आह्वान/चित्त की योग्यता
का वर्णन/शासन करते हुए यह कार्य करो।
परिशिष्ट : इसमें कई गाथाओं में आए संकेतों को स्पष्ट करनेवाली कथाएँ/दृष्टांत
हैं। अतिप्रचलित कथाएँ संक्षेप में हैं। ये द्वितीय संस्करण के साथ
जोडे गए हैं। मोक्ष-पुरुषार्थ भाग 4 में आए चार अध्ययनों में 215
(51+60+60+44) गाथाएँ हैं। इसका द्वितीय संस्करण सं. 2057 सन् 2000
में प्रकाशित हुआ। इसमें अधिकांश कथाएँ द्वितीय संस्करण में जोडी गई
हैं। |