अणु का साहित्य
मोक्ष-पुरुषार्थ : भाग-3


इसमें बोल क्र. 11 पर चार परिच्छेदों द्वारा विषद् विवेचन है। कषाय पर 313 गाथाओं में इस एकमात्र बोल पर चिंतन प्रस्तुत किया गया है। तीसरे भाग में आए प्रमुख बिन्दुओं का परिचय निम्नानुसार है -

बारहवाँ अध्ययन : बोल क्र. 11 - कषाय ने पतली करीने निर्मूल करे तो जीव वेगो-वेगो मोक्ष में जाय।

प्रथम परिच्छेद : कषाय स्वरूप
मंगलाचरण/कषाय-स्वरूप/बोल के क्रम का हेतु/कषाय की परिभाषा/कषाय के भेद/बंध का हेतु-कषाय/कषाय की द्विरूपता/कर्म प्रकृतियों का बंध/प्रभेद/कषायों के चौसठ प्रकार।

द्वितीय परिच्छेद : कषायों का कृशीकरण

कषाय-शत्रुओं के विनाश का क्रम/आठ उपाय

(1) स्वरूप चिन्तन द्वार : क्रोध से होने वाली जीव की दशा/क्रोध की प्रतिक्रिया/क्रिया पहचानने के लक्षण/क्रोध के स्तर की पहचान/क्रोध की उत्पत्ति के कारण/मान के कार्य/मान की अनुक्रियाएँ/महत्व पाने के लिए जीव के नाटक/मान की प्रतिक्रिया का स्वरूप/महत्वासक्ति की उत्पत्ति की पहचान/मानोदय के लक्षण/मान के स्तर की पहचान/मान की उत्पत्ति के हेतु/माया के रूप/माया के विषय में समझ/माया की क्रियाएँ/शांतिक्रिया से होने वाली अनुक्रियाएँ/क्राँतिक्रिया की अनुक्रियाएँ/माया की प्रतिक्रिया/माया के स्तर की पहचान/माया की मोहकता/माया के उत्पादक/लोभ की परिभाषा/लोभ की क्रियाएँ/लोभ की अनुक्रियाएँ/लोभ की प्रतिक्रियाएँ/लोभ की क्रिया पहचानने के लक्षण/लोभ के स्तर की पहचान/लोभ की योनि/कषाय-स्वरूप-चिंतन का फल।

(2) निरीक्षण द्वार : निरीक्षण एवं उसमें सावधानी की प्रेरणा/यथार्थ निरीक्षण की द्विविधता/सावधानी से आलोकन/चिन्तन-निरीक्षण/कषाय प्रवृत्ति में विपर्यास/निरीक्षण का फल।

(3) हानि-पश्यना द्वार : (अ) ''क्रोध हानि पश्यना''- क्रोध से देह की हानि/आभ्यंतर हानि-आराधना की हानि-सामूहिकता की हानि-पारलौकिक हानि-क्रोध जहर है और उत्पादक भी - क्रोध की दानवता।

(ब) ''मान-हानि-पश्यना'': गुरु की आशातना, धर्म की हानि, भाव की हानि। इहलौकिक हानि/पारलौकिक हानि/मान मधुर जहर/मान, मान का अपहारक/मान प्राप्ति एवं सुरक्षा के लिए पाप।

(स) ''माया-हानि-पश्यना'': धर्म की हानि/ऋजुता और मैत्री का नाश/मायी स्वयं ठगा जाता है/माया शब्द सब कषायों की वाचक/माया और अन्य कषायों की अन्योन्य-आश्रयता/माया और मिथ्यात्व के विषय में आगम प्रमाण/गति की हीनता।

(द) ''लोभ हानि-पश्यना'': उत्तम भाव का नाश और अशुभ भावों का उत्पादन/दुष्कर्म में प्रवृत्ति/स्व-पर में शत्रुता/प्रामाणिकता एवं धर्म का नाश/लोभ से प्रिय की घात/परलोक की हानि - रस लालसा से चरित्र और भव की हानि।

(4) हेयत्व पश्यना द्वार : कषाय घृणा के योग्य/कषाय के हेयत्व के अन्य हेतु।

(5) अनुपादेयता-पश्यना द्वार : स्वरूप एवं उद्देश्य/कषाय की मोहरूपता/कषाय से आकुलता/कषाय से लाभ नहीं/कषाय में राग छोडो।

(6) अनात्मा-पश्यना : चेतना की विकृति के हेतु/निजस्वरूप नहीं/पर रूपता-अनात्मता।

(7) अपरिग्रह द्वार : कषायों का परिग्रह प्रयत्नजन्य/क्रोध का परिग्रह/मान का परिग्रह/माया-लोभ का परिग्रह/कषायों के परिग्रह को जानना कठिन/आभ्यान्तर परिग्रह को समझने की शक्ति कैसे प्राप्त हो? /कषाय परिग्रह को छोडने का क्रम और फल।

(8) अरुचि द्वार : आनन्द मत मानों/घृणित पदार्थ घृणा योग्य/कषाय में जीव को कैसा लगना चाहिए? /कषायों में अरुचि का फल/व्यवस्थित विधि और विकल्प/विधि और अविधि से भी अभ्यास क्यों करना? /धैर्यवान ही अभ्यासी।

तीसरा परिच्छेद - वशीकरण
कषाय उदय में जीव की परवशता/कषाय जेता विरले/कषाय जय स्वरूप/कषाय वशीकरण के नौ उपाय निम्नानुसार हैं -

(1) दर्शन द्वार : दर्शन के भेद प्रभेद/प्रसंग-प्रेक्षण/श्वास-प्रेक्षण/देह प्रेक्षण/बाह्य प्रेक्षा से करणीय कार्य/साधना मात्र इतना नहीं/मन निरीक्षण/अन्तोदर्शन का फल आत्मदर्शन/आत्मदर्शन का प्रयोग।

(2) प्रतिसंलीनता द्वार : आशय/शास्त्रीय स्वरूप।

(3) इच्छा त्याग द्वार : कषायों का मूल इच्छा/इच्छा की भयंकरता एवं त्याग शुद्धि।

(4) अदीनता द्वार : आत्मा स्वामी है। कषायों के प्रति साधक के भाव/कषायों से हारे नहीं/आत्म बली की जय।

(5) आज्ञा स्मृति द्वार : आत्मविश्वास में हेतु। जिनाज्ञा से बाहर साधना नहीं/जीव जिनाज्ञा भूल जाता है/जिनाज्ञा का स्मरण करो/कषाय उत्पात करे तो क्या करना?

(6) दृष्टान्त द्वार : दृष्टान्त क्या? /पाँच प्रकार/दृष्टान्त का वांचन/वांचन और स्मृति के अर्थ सुभाव का अर्थ/दृष्टान्तों का महत्व।

(7) विरोधी भाव द्वार : क्षमा-विनय-ऋजुता-संतोष के रूप/इनके द्वारा कषायों को कैसे जीतें?

(8) गुरु आज्ञा में हर्ष : जीव की स्वच्छंद वृत्ति/गधा भी निर्बंध/स्वच्छंद क्या विमुक्त है? /स्वच्छंदों की गुरुजन के प्रति दृष्टि/आज्ञा-खण्डन-पालन के कारण/आज्ञा प्राप्ति पर उत्तम भाव धारण करना/आज्ञा प्राप्त किए बिना कुछ नहीं करें/गुरु आज्ञा में हर्ष का फल/गुरु आज्ञा से कषाय जय की विधि।

(9) कर्म-विपाक-चिंतन द्वार : कर्म विपाक के प्रति भाव/घाति कर्म-विपाक के प्रति भाव/विकार रूप-विपाक के प्रति भाव/अप्रमत्त बनो/उत्साही बनो/शुभ-अशुभ दोनों प्रकार के परिणाम फलवान।

चौथा परिच्छेद - क्षयकरण
कषाय-क्षय की प्रवृत्ति का प्रारंभ/क्षय की परिभाषा/कर्मक्षय का हेतु- भाव विशुद्धि/विशुद्ध भाव के प्रकार।

(1) प्रशम द्वार : परिभाषा/अन्यमत-निषेध/अन्यमत की अयुक्तता का हेतु/कषाय-विवेक और समभाव/कषाय राग की भयंकरता/रागद्वेष को उलट दो/यह कैसे हो?

(2) संवेग द्वार : स्वरूप एवं कार्य/संवेग से कषाय राग का अभाव/संवेग का आविर्भाव एवं कार्य।

(3) निर्वेद द्वार : भव और उसमें अरुचि/भव भीति-विषय भीति/कषाय और भोग का राग/ज्ञानी का भोगासक्ति पर पश्चाताप/निर्वेद से दो चतुष्कों का क्षय/निर्वेद में भोगों के प्रति भाव/निर्वेद से निष्पन्न त्याग रूप फल/निर्वेद से मोक्षमार्ग पर गमन।

(4) धर्मश्रद्धा द्वार : धर्मश्रद्धा बलवर्द्धिनी/धर्मश्रद्धा की आवश्यकता/धर्म में बाधक कारण और तज्जनित भाव/साता सुख में आसक्ति/धर्म चिन्ता से होने वाले भाव/धर्मश्रद्धा को वेग प्राप्त/धर्म श्रद्धा से आगे के कार्य।

(5) प्रलोकना द्वार : परिभाषा/भेद/उपयोग प्रलोकना का विशेष स्पष्टीकरण/इस भव आरोहण के विषय में/संज्वलन के क्षय की कठिनता/संज्वलन कषाय से जीव की स्थिति/आलोचना का स्वरूप-विधि एवं कार्य।

(6) आत्मनिन्दा द्वार : भाव भूमिका/आत्मनिन्दा का उत्थान/शौर्यमय चिंतन।

(7) गर्हा द्वार : तैयारी/फल।

(8) क्षय हेतु क्रम विचार : दो क्रम/भाव और क्रिया/अशुभयोग से निवृत्ति/क्रिया के लिए कषाय नहीं करना।

(9) अन्य उपाय और उपसंहार तथा चूलिका।

मोक्ष पुरुषार्थ के इस तीसरे भाग में कुल 313 गाथाओं के माध्यम से कषाय पर चिन्तन किया गया है। इसका प्रथम संस्करण सं. 2047 सन्‌ 1990 में प्रकाशित हुआ। इसमें अनेक घटित कथाएँ हैं, लेकिन उनके पात्रों के नाम बदल दिए गए हैं।