अणु का साहित्य
मोक्ष-पुरुषार्थ : भाग-1

प्रथम अध्ययन : मंगलाचरण और प्रतिज्ञा/पुरुषार्थ के भेद/पुरुषार्थ के कार्य/पुरुषार्थ का पारस्परिक संपोषण/मोक्ष पुरुषार्थ की प्रधानता/वर्ण्य विषयों का निर्देश।

दूसरा अध्ययन : प्रथम बोल (1) मोक्ष की इच्छा राखे तो जीव वेगो-वेगो मोक्ष में जावे।

इच्छा/इच्छाओं के प्रकार और मोक्ष की इच्छा/मोक्ष की इच्छा के आभ्यंतर हेतु/मोक्ष की इच्छा का फल/संवेग के परस्पर फल/संवेग प्राप्ति की भावना।

तृतीय अध्ययन : बोल क्र. 2- उग्र तपस्या करे तो जीव वेगो-वेगो मोक्ष में जावे।
बोल क्रम का कारण/तप बिना सिद्धि नहीं/पीड़ा से मत डर/तप की परिभाषा और भेद/बाह्य तप/आभ्यंतर तप/बाह्याभ्यंतर तपों का परस्पर संबंध/उग्र तप कौन सा? /उग्र तप का फल/तप का आव्हान।

चौथा अध्ययन : बोल क्र. 3 - 'गुरु मुख से सूत्र-सिद्धांत सुने तो जीव वेगो-वेगो मोक्ष में जाय'

बोल के क्रम का कारण/श्रुत के पात्र/प्रधान श्रुत/श्रुत के दाता/श्रुत के लिए गुरु की पर्युपासना/गुरु मुख से श्रुत प्राप्ति के लाभ/गुरु सेवा मोक्ष का राजमार्ग/गुरु के प्रति सन्मुखता की भावना।

पाँचवाँ अध्ययन : बोल क्र. 4 - सूत्र सिद्धांत सुनकर वैसी प्रवृत्ति करे तो जीव वेगो-वेगो मोक्ष में जाय

बोल का क्रम/श्रोता के भेद/जानकारी और बुद्धिमत्ता/श्रेय-अश्रेय का निर्णय में बाधक कारण/स्वर्गादि वर्णन से अप्रामाणिकता नहीं है। जिन भगवान ही आप्त हैं/जिनेश्वर यथार्थ श्रुत के ही दाता/यथार्थ श्रुत को धारण करना/धारण किए हुए श्रुत का प्रभाव/सम्यक्‌-प्रवृत्ति-मोक्षमार्ग का प्रधान अंग/मोक्ष के कारणों का समायोग/सम्यक्‌ प्रवृत्तिवालों के उदाहरण/मुनि-मुनित्व से मुक्त होता है/सम्यक्‌ प्रवृत्ति की भावना।

छठा अध्ययन : बोल क्र. 5- पाँचो इंद्रियाँ वश करे तो जीव वेगो-वेगो मोक्ष में जाय

बोल का क्रम/जीव और इन्द्रियाँ/जीवों की विषयरतता/विषयाधीनता से हानि/विषयाधीन कौन? /इन्द्रियों का अनिग्रह क्या? /इन्द्रिय-निग्रह का स्वरूप और उपाय/इन्द्रिय निग्रह के कुछ उपायों का निषेध/अंशमात्र असावधानी भी भयंकर/इन्द्रिय जय की भावना।

सातवाँ अध्ययन : बोल क्र. 6 - छकाय जीवों की रक्षा करे तो जीव वेगो-वेगो मोक्ष में जाए।
बोल का क्रम/जीव स्वरूप जानने की आवश्यकता/ यथार्थ भावों को जानने का अद्वितीय साधन/जिनागमों की अद्वितीयता का कारण/जीव का स्वरूप/जीव और प्राण/मरण और हिंसा/हिंसा के कारण/हिंसा का स्वरूप और प्रेरणा/जीव-रक्षा के विविध रूप/दया के आठ भेद/दया के विषय में कुछ मतों का निषेध/जीवदया पालकों के दृष्टांत/जीवदया का माहात्म्य/जीव रक्षा जीवन में अवतरे।

आठवाँ अध्ययन : बोल क्र. 7 - भोजन समय साधु-साध्वी की भावना भावे तो जीव वेगो-वेगो मोक्ष में जावे।

बोल का क्रम औचित्य/आहार संज्ञा/एक भक्षित्व का उपचार/प्रतिक्षा में भूखे रहना/किसकी भावना सफल/मुनि भी संविभाग करे/संविभाग भावना का फल/भावना की भावना।

इस भाग में कुल 359 गाथाएँ हैं। कई ऐतिहासिक-धार्मिक-घटित एवं नवीन कथाएँ/दृष्टांत इसमें दिए गए हैं। प्रथम आवृत्ति संवत्‌ 2042 एवं द्वितीय आवृत्ति संवत्‌ 2053 (सन्‌ 1997) में प्रकाशित की गई।