आचार्य श्री उमेशमुनिजी म.सा. के संभावित विचरण स्थल

अणु संदेश

क्षमा अर्थात्‌ सहनशीलता
आचार्यश्री पू. श्री उमेशमुनिजी म.सा. 'अणु' द्वारा हस्तलिखित अणु संदेश
 
क्षमा अर्थात्‌ सहनशीलता। मन सहनशील कैसे बने? तीन प्रकार से सहनशीलता की वृद्धि हो सकती है-चिंतन से, आवेश में नहीं बहने से और अभ्यास से। ...  आगे पढें...

पुस्तक के लेखक श्री उमेशमुनिजी ने अपने नामोल्लेख के अतिरिक्त अपना कुछ भी परिचय पुस्तक में नहीं दिया है। अतएव यह आवश्यक प्रतीत होता है कि उनके विषय में संक्षिप्त जानकारी प्रस्तुत की जावे। वर्तमान मध्य देश राज्य के... आगे पढें...

अणु साहित्य म.सा. के द्वारा लिखित अनूठा साहित्य संग्रह है। कहते हैं साहित्य समाज का दर्पण होता है और म.सा. ने इस अनूठे साहित्य की रचना करके समाज को एक अनूठे मुकाम पर पहुँचाया है। यही नहीं समाज की सोच....   आगे पढें...

आचार्यश्री द्वारा जीवन को सौम्य और सरल व सादगी हेतु आवश्यक सूत्रों का मार्ग दर्शाया है, जो कि इस प्रकार है -
1. सामायिक-सूत्
2. प्रतिक्रमण-संकल्प-सूत्
3. पच्चक्खाण के पाठ

4. प्रतिक्रमण की विधि

पूज्य श्री धर्मदासजी महाराज के जीवन से संबंधित ऐतिहासिक सामग्री की प्राप्ति नहिवत्‌ ही है। उनके जीवन से संबंधित अंशमात्र उल्लेख यत्र-तत्र प्राप्त हो जाते हैं। उनके पूर्व जीवन के विषय में विशेष वर्णन प्राप्त नहीं होता है। उनके... आगे पढें...

जो मुझे आपसे कहना है...सुज्ञ श्रद्धालु उपासक-जन! एवं उपासिकावृन्द! जिनवर प्रभु तीर्थर देव के द्वारा स्थापित चतुर्विधतीर्थ के हम सदस्य हैं। हम अंतिम तीर्थरदेव भगवान महावीर देव के शासन के अनुयायी हैं। श्रमण भगवान...-  आगे पढें...

जैनधर्म भारत-वर्ष का अति प्राचीन धर्म है। इसमें कई परंपराएँ हैं और कई सम्प्रदाय-उपसम्प्रदाय हैं। धर्म-विशाल वटवृक्ष के समान है। उसकी सम्प्रदायें और परम्परायें ही उसे विशालता प्रदान करती है। जिस सम्प्रदाय में अतीत .....  आगे पढें...

... और करुणा की धार फूटी
जब आचार्यश्री को लगा कि नवदीक्षित श्री दर्शनमुनि को केशलोचन से सम्भवत: तनिक पीड़ा हुई है तो उनके हृदय से करुणा की धार फूट पड़ी और समीप ही बैठे दर्शनमुनिजी का माथा शिखा के स्थान से सहलाते-सहलाते अपनी गोद में भर लिया और दो-तीन मर्तबा पीठ थपथपा दी। लघुवय में ही सिर से माता-पिता का साया खो चुके इस नवमुनिराज ने संयम प्राप्त करने के चंद लम्हों में ही आचार्य भगवंत का पितृतुल्य वो ....
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